TPA धारा 69: विक्रय करने की शक्ति कब विधिमान्य होती है
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 · अध्याय 4: स्थावर संपत्ति के बंधक और भार
अध्याय मार्गदर्शक पढ़ें और अभ्यास करें →
अन्य भाषाओं में भी: English
69. विक्रय करने की शक्ति कब विधिमान्य होती है-
(1) बंधकदार को, या उसकी ओर से कार्य करने वाले किसी व्यक्ति को, इस धारा के उपबंधों के अध्यधीन निम्नलिखित दशाओं में ही, न कि किन्हीं भी अन्य दशाओं में, यह शक्ति होगी कि बंधक-
धन के संदाय में व्यतिक्रम होने पर न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना वह बंधक सम्पत्ति या उसका कोई भाग बेच दे या बेचे जाने में सहमत हो जाए, अर्थात्-
(क) जहाँ कि बंधक अंग्रेजी-बंधक है और न तो बंधककर्ता और न बंधकदार हिन्दू, मुसलमान या बौद्ध या राज्य सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में इस निमित्त समय-समय पर विनिर्दिष्ट किसी अन्य मूलवंश, पंथ, जनजाति या वर्ग का सदस्य है;
(ख) जहाँ कि बंधकदार को बंधक विलेख द्वारा अभिव्यक्त रूप से यह शक्ति प्रदत्त है कि वह न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना विक्रय करा सके और बंधकदार सरकार है,
(ग) जहाँ कि बंधकदार को बंधक विलेख द्वारा अभिव्यक्त रूप से यह शक्ति प्रदत्त है कि वह न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना विक्रय करा सके और बंधक सम्पत्ति या उसका कोई भाग बंधक विलेख के निष्पादन की तारीख को कलकत्ता, मद्रास मुम्बई के नगरों के भीतर स्थित था या किसी अन्य नगर या क्षेत्र में स्थित था, जिसे राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस बारे में विनिर्दिष्ट करे।
(2) ऐसी कोई भी शक्ति प्रयोग में न लाई जाएगी यदि और जब तक-
(क) मूलधन के संदाय की अपेक्षा करने वाली लिखित सूचना की तामील बंधककर्त्ता या कई बंधककर्ताओं में से किसी एक पर न कर दी गयी हो और मूलधन या उसके किसी भाग का संदाय करने में ऐसी तामील के पश्चात् तीन मास तक व्यतिक्रम न किया गया हो, अथवा
(ख) बंधक के अधीन कुछ ब्याज, जिसकी रकम कम से कम पाँच सौ रुपए हो, बकाया न हो और शोध्य होने के पश्चात् तीन मास तक अदत्त न रहा हो।
(3) जबकि विक्रय ऐसी शक्ति के परव्यंजित प्रयोग में कर दिया गया है तब क्रेत्ता का हक इस आधार पर अधिक्षेपणीय न होगा कि उस विक्रय को प्राधिकृत करने के लिए कोई भी दशा पैदा न हुई थी जिसमें वह विक्रय प्राधिकृत होता या कि सम्यक् सूचना नहीं दी गयी थी या कि शक्ति अन्यथा अनुचित या अनियमित रूप से प्रयुक्त की गई थी; किन्तु इस शक्ति के किसी अप्राधिकृत या अनुचित या अनियमित प्रयोग से क्षतिग्रस्त व्यक्ति को उस शक्ति का प्रयोग करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध नुकसानी प्राप्ति का उपचार उपलब्ध होगा।
(4) बंधकदार को विक्रय द्वारा जो धन प्राप्त हुआ है, वह उन पूर्विक विल्लंगमों के, यदि कोई हों उन्मोचन के पश्चात् जिनके अध्यधीन वह विक्रय नहीं किया गया है, या न्यायालय में धारा 57 के अधीन वह राशि जमा किए जाने के पश्चात्, जो किसी पूर्विक विल्लंगम को चुकाने के लिए पर्याप्त है तत्प्रतिकूल संविदा न हो, तो प्रथमतः विक्रय या किसी प्रयतित विक्रय के प्रसंगत अपने द्वारा उचित रूप से उपगत सब खर्चो, प्रभारों और व्ययों का संदाय करने में और द्वितीयतः बंधक धन और खर्च और बंधक के अधीन शोध्य अन्य धन के यदि कोई हो, भुगतान में अपने द्वारा उपयोजित किए जाने के लिए बंधकदार न्यासतः धारित रखेगा, और इस प्रकार प्राप्त धन की अवशिष्टि बंधक-सम्पत्ति के हकदार, या उसके विक्रय के आगमों की रसीद देने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति को दे दी जाएगी।
(5) इस धारा या धारा 69क की कोई भी बात 1882 की जुलाई के पहले दिन से पूर्व प्रदत्त शक्तियों को लागू नहीं है।
आधिकारिक संदर्भ: भारत सरकार का हिंदी संदर्भ पाठ — जाँच की तारीख: 30 सितंबर 2026.अध्ययन के लिए Banaka का संपादित हिंदी पाठ, आधिकारिक समेकित संस्करण नहीं। पठनीय कानूनी HTML और सरकारी हिंदी संदर्भ से तैयार किया गया है; संख्या और संदर्भ की त्रुटियाँ सुधारी गई हैं। यह केंद्रीय पाठ है; राज्य संशोधन, क्षेत्रीय अधिसूचनाएँ और अन्य लागू कानून अलग देखें। जाँच की तारीख स्रोत-संस्करण की तारीख नहीं है।मूल अनुसूची और संशोधन टिप्पणियाँ देखें
यह पाठ केवल संदर्भ के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक स्रोत देखें।
इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 58. 'बन्धक', 'बन्धककर्त्ता', 'बन्धकदार', 'बन्धक धन' और 'बन्धक विलेख' की परिभाषा
- 59. बन्धक कब हस्तान्तरण-पत्र द्वारा किया जाना चाहिए
- 59A. बन्धककर्त्ताओं और बन्धकदारों के प्रति निर्देशों के अन्तर्गत वे व्यक्ति भी हैं जिन्हें उनसे हक व्युत्पन्न हुआ है
- 60. मोचन करने का बन्धककर्ता का अधिकार
- 60A. बन्धककर्त्ता को प्रति-अन्तरण करने के बजाय किसी तृतीय पक्षकार को अन्तरण करने की बाध्यता
- 60B. दस्तावेजों के निरीक्षण और पेश कराने का अधिकार
- 61. पृथक्तया या साथ-साथ मोचन कराने का अधिकार
- 62. कब्जा प्रत्युद्धरण का भोग-बन्धककर्त्ता का अधिकार
- 63. बन्धक सम्पत्ति में अनुवृद्धि
- 63A. बन्धक सम्पत्ति में अभिवृद्धि
- 64. बन्धकित पट्टे का नवीकरण
- 65. बन्धककर्त्ता द्वारा विवक्षित संविदाएँ
- 65A. बंधककर्त्ता की पट्टा करने की शक्ति
- 66. कब्जा रखने वाले बंधककर्त्ता द्वारा दुर्व्यय
- 67. पुरोबंध या विक्रय का अधिकार
- 67A. बंधकदार कई बंधकों के आधार पर एक वाद लाने को कब आबद्ध होता है
- 68. बंधक-धन के लिए वाद लाने का अधिकार
- 69A. रिसीवर की नियुक्ति
- 70. बंधक-सम्पत्ति में अनुवृद्धि
- 71. बन्धकित पट्टे का नवीकरण
- 72. सकब्जा बन्धकदार के अधिकार
- 73. राजस्व के लिए किए गए विक्रय के आगमों पर या अर्जन पर प्रतिकर पर अधिकार
- 74. सम्पत्ति अन्तरण (संशोधन) अधिनियम, 1929 (1929 का 20) की धारा 39 द्वारा निरसित
- 75. सम्पत्ति अन्तरण (संशोधन) अधिनियम, 1929 (1929 का 20) की धारा 39 द्वारा निरसित
- 76. सकब्जा बन्धकदार का दायित्व
- 77. ब्याज के बदले में प्राप्तियाँ
- 78. पूर्विक बंधकदार का मुल्तवी होना
- 79. जब कि अधिकतम रकम अभिव्यक्त है, तब अनिश्चित रकम को प्रतिभूत करने के लिए बंधक
- 80. सम्पत्ति अन्तरण (संशोधन) अधिनियम, 1929 (1929 का 20) की धारा 41 द्वारा निरसित
- 81. प्रतिभूतियों का क्रमबंधन
- 82. बंधक ऋण की बाबत अभिदाय
- 83. बंधक मद्दे शोध्य धन का न्यायालय में निक्षेप करने की शक्ति
- 84. ब्याज का बन्द हो जाना
- 85. (सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (1908 का 5) की धारा 156 तथा अनुसूची 5 द्वारा निरसित)
- 86. निरसित धारा
- 87. निरसित धारा
- 88. निरसित धारा
- 89. निरसित धारा
- 90. निरसित धारा
- 91. वे व्यक्ति जो मोचन के लिए वाद ला सकेंगे
- 92. प्रत्यासन
- 93. आबंधन का प्रतिषेध
- 94. मध्यवर्ती बन्धकदार के अधिकार
- 95. मोचन कराने वाले सह-बन्धककर्त्ता का व्यय पाने का अधिकार
- 96. हक-विलेखों के निक्षेप द्वारा बन्धक
- 97. सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का अधिनियम 5) की धारा 156 तथा पाँचवीं अनुसूची द्वारा निरसित
- 98. विलक्षण बन्धकों के पक्षकारों के अधिकार और दायित्व
- 99. सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का अधिनियम 5) की धारा 156 तथा पांचवीं अनुसूची द्वारा निरसित
- 100. भार
- 101. पाश्चिक विल्लंगमों के विद्यमान होने पर विलयन न होगा
- 102. अभिकर्त्ता पर तामील या उसकी निविदा
- 103. संविदा करने के लिए अक्षम व्यक्ति को या उस द्वारा सूचना इत्यादि
- 104. नियम बनाने की शक्ति