मध्यकता समझें
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नीचे के उदाहरण और व्याख्याएँ मौलिक अध्ययन सामग्री हैं, वैधानिक हिंदी अनुवाद नहीं। संबंधित प्रावधान की प्रवर्तन सूचना अलग से पढ़ें।
दायरा, सहमति और योग्य विवाद
धारा 2 भारत में आयोजित मध्यकता और निर्दिष्ट संबंधों से जुड़ी है, जिनमें घरेलू पक्षकार, इस अधिनियम के उपयोग का करार और अंतरराष्ट्रीय मध्यकता आते हैं। सरकारी पक्षकार वाले विवादों में वाणिज्यिक या अधिसूचित विवाद की विशेष शर्तें हैं; सार्वजनिक निकाय से हर विवाद योग्य न मानें। प्रक्रिया चुनने से पहले वास्तविक दायरा और प्रवर्तन पढ़ें।
धारा 4 का मध्यकता करार विवाद को मध्यकता में भेजता है; यह विवाद सुलझाने वाला धारा 19 का समझौता नहीं है। लिखित रूप में संविदा का खंड, अलग करार या योग्य इलेक्ट्रॉनिक संचार शामिल हो सकते हैं। धारा 5(1) स्वैच्छिक और परस्पर सहमति वाले पूर्व-मुकदमा कदम बताती है, पर निर्दिष्ट मूल्य के वाणिज्यिक विवादों के लिए वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम की धारा 12A की अलग व्यवस्था बनाए रखती है। इसे ‘हर दीवानी वाद से पहले मध्यकता अनिवार्य है’ न बनाएँ।
धारा 6 और पहली अनुसूची मध्यकता के लिए अयोग्य विषय बताते हैं। शमनीय अपराध वाला परंतुक उचित न्यायालय संदर्भ की अनुमति देता है, पर परिणाम को धारा 27(2) का निर्णय या डिक्री नहीं मानता और लागू कानून के अनुसार न्यायालय का विचार आवश्यक रखता है। पक्षकारों की सहमति मात्र वैधानिक अपवाद समाप्त नहीं करती। यह वेबसाइट आपके विवाद की पात्रता तय नहीं करती।
नियुक्ति, हित-संघर्ष और प्रक्रिया
धारा 8 पक्षकारों को मध्यस्थ और नियुक्ति प्रक्रिया पर सहमत होने देती है और सहमति न होने पर सेवा प्रदाता की व्यवस्था बताती है। धारा 10 मध्यकता से पहले संभावित हित-संघर्ष और बाद में उत्पन्न संघर्ष का अविलंब लिखित प्रकटीकरण अपेक्षित करती है। आपत्ति छोड़ने के लिए सभी पक्षकारों को लिखित रूप में व्यक्त करना होता है; मौन वह लिखित सहमति नहीं है।
धारा 18 मध्यस्थ के समक्ष पहली उपस्थिति के लिए तय तारीख से 120 दिन गिनती है, वेबसाइट की पहली यात्रा या अनौपचारिक पूछताछ से नहीं। पक्षकारों द्वारा सहमत विस्तार आगे साठ दिन से अधिक नहीं हो सकता। धारा 24 समझौते, मध्यस्थ की लिखित घोषणा, पक्षकार के लिखित बाहर होने के संचार या समय समाप्त होने पर अलग समाप्ति बताती है। ये पाठ समझने के उदाहरण हैं, किसी चालू मामले की समय-सीमा गणना नहीं।
धारा 21 की असमझौता रिपोर्ट में विफलता का कारण या मध्यकता में पक्षकारों के आचरण की सामग्री नहीं बतानी चाहिए। धारा 20 निर्दिष्ट पंजीकरण को अभिलेख के लिए वैकल्पिक रखती है और न्यायालय या अधिकरण द्वारा संदर्भित तथा लोक अदालत समझौतों के अपवाद अलग करती है। इसका स्पष्टीकरण धारा 27 और 28 के अधिकार बनाए रखता है; वैकल्पिक पंजीकरण को प्रवर्तन की सार्वभौमिक शर्त न मानें। इन व्यवस्थाओं पर निर्भर होने से पहले प्रवर्तन और लागू नियम जाँचें।
ऑनलाइन, सामुदायिक मध्यकता और अधिसूचित प्रवर्तन
धारा 30 लिखित सहमति, कार्यवाही की अखंडता और गोपनीयता के उपायों के साथ ऑनलाइन मध्यकता बताती है। धारा 43 स्थानीय शांति और सद्भाव के लिए पूर्व परस्पर सहमति से सामुदायिक मध्यकता बताती है; धारा 44 में तीन मध्यस्थों का पैनल है। धारा 44(4) का सामुदायिक समझौता स्पष्टतः दीवानी न्यायालय के निर्णय या डिक्री की तरह प्रवर्तनीय नहीं है। ऑनलाइन या सामुदायिक मध्यकता धारा 27 के हर समझौते का सामान्य विकल्प नहीं है।
दर्ज का.आ. 4384(अ), प्रभावी 9 अक्टूबर 2023, धाराएँ 1, 3, 26, 31–38, 45–47, 50–54 और 56–57 शामिल करती है। इससे पूरा अधिनियम प्रवृत्त नहीं होता। रीडर सत्यापित दायरे को दर्ज सूचनाओं में शामिल न होने वाले उपबंध से अलग रखता है; खाली रिकॉर्ड यह प्रमाण नहीं कि कोई बाद की अधिसूचना नहीं है। प्रक्रिया या प्रवर्तन पर निर्भर होने से पहले संबंधित वर्तमान सरकारी अधिसूचनाएँ जाँचें।
27 अगस्त 2026 की का.आ. 4781(अ) धारा 31(1) के अधीन दिल्ली स्थित प्रधान कार्यालय वाली भारतीय मध्यकता परिषद स्थापित करती है। परिषद की स्थापना हर प्रक्रिया संबंधी उपबंध का प्रवर्तन नहीं है। रात्रिकालीन स्थिर बिल्ड ज्ञात तारीखें आगे बढ़ा सकते हैं, नई अधिसूचनाएँ नहीं खोजते। Banaka संदर्भ और अध्ययन देता है, मध्यस्थ नियुक्ति, बुकिंग, दस्तावेज पंजीकरण या विवाद जमा करने की सेवा नहीं।
गोपनीयता की सीमाएँ हैं
धारा 22 निर्दिष्ट मध्यकता संचार की गोपनीयता बताती है, जिसमें समझौते के प्रस्ताव, स्वीकारोक्तियाँ और केवल मध्यकता के लिए तैयार दस्तावेज शामिल हैं। पक्षकार, प्रतिभागी, मध्यस्थ और सेवा प्रदाता प्रत्यक्ष या ऑनलाइन कार्यवाही की ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं कर सकते। निजी बैठक का अर्थ गुप्त रिकॉर्डिंग की अनुमति नहीं है।
समझौता स्वयं गोपनीय बातचीत की सामग्री से अलग है। धारा 22 का स्पष्टीकरण पंजीकरण, प्रवर्तन और चुनौती के लिए समझौते के आवश्यक प्रकटीकरण को अलग रखता है। शोध, रिपोर्ट या प्रशिक्षण के लिए सामान्य जानकारी तभी दी जा सकती है जब उससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पक्षकार, प्रतिभागी या विशेष विवाद की पहचान न हो।
धारा 23 पूर्ण गोपनीयता की गारंटी नहीं देती। इसकी सीमाओं में मध्यस्थ का पेशागत कदाचार, अपराध करने की धमकी या योजना, घरेलू हिंसा या बाल दुर्व्यवहार तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य या सुरक्षा को गंभीर आसन्न खतरा दिखाने वाले कथन आते हैं। सामान्य भुगतान प्रस्ताव और तत्काल नुकसान की धमकी एक प्रकार का संचार नहीं हैं। वास्तविक मामले में नियम लागू करने से पहले संबंधित प्रवर्तन और प्रक्रिया जाँचें।
प्रवर्तन नया मुकदमा नहीं है
धारा 27 पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित और मध्यस्थ द्वारा प्रमाणीकृत समझौते को अंतिम तथा बाध्यकारी बताती है। धारा 28 के अधीन उसका प्रवर्तन सिविल प्रक्रिया संहिता के अनुसार न्यायालय के निर्णय या डिक्री की तरह होता है। इसे बिना हस्ताक्षर के सुझाव, बातचीत करने की सामान्य सहमति या हर समझौते के लिए यह रास्ता अभी उपलब्ध होने की गारंटी न समझें।
धारा 28 चार आधार बताती है: कपट, भ्रष्टाचार, प्रतिरूपण और धारा 6 के अनुसार मध्यकता योग्य न होने वाले विषय में मध्यकता। समझौते की प्रति मिलने से नब्बे दिन के भीतर आवेदन का प्रावधान है; पर्याप्त कारण होने पर न्यायालय या अधिकरण आगे नब्बे दिन की अवधि में आवेदन ग्रहण कर सकता है। यह विस्तार अपने-आप नहीं मिलता और सौदे पर पछतावा अतिरिक्त सूचीबद्ध आधार नहीं है।
धारा 29 परिसीमा की गणना में मध्यकता की निर्दिष्ट अवधि को छोड़ने का विषय बताती है। यह धारा 28 की चुनौती अवधि से अलग है। यहाँ किसी मामले की अंतिम तारीख की गणना नहीं की जाती: किसी समय-सीमा पर निर्भर होने से पहले लागू कानून, वैधानिक प्रवर्तन, प्रति मिलने की तारीख और संबंधित कार्यवाही योग्य सलाहकार के साथ जाँचें।
मध्यस्थ न्यायाधीश नहीं है
धारा 3(h) में मध्यकता वह प्रक्रिया है जिसमें पक्षकार मध्यस्थ की सहायता से आपसी सहमति द्वारा विवाद सुलझाने का प्रयास करते हैं। मध्यस्थ को समझौता थोपने का अधिकार नहीं है। न्यायालय या पंचाट के निर्णय से यही मुख्य अंतर है: सहमति बनाने में सहायता देना, किसी पक्ष की जीत तय करने की शक्ति नहीं है।
धारा 16 स्वैच्छिक समाधान में मध्यस्थ की भूमिका बताती है। धारा 17 विवाद से संबंधित निर्दिष्ट कार्यवाही में मध्यस्थ के पंच, प्रतिनिधि या वकील के रूप में कार्य करने और उसे साक्षी बनाने पर रोक बताती है। इन उपबंधों का वास्तविक दायरा पढ़ें; इन्हें हर परिस्थिति में हर बातचीत सुरक्षित रहने की गारंटी न समझें।
काल्पनिक उदाहरण: दो पड़ोसी साझा मरम्मत के भुगतान पर चर्चा करते हैं। मध्यस्थ दोनों को स्वीकार्य राशि और भुगतान की तारीखें तय करने में मदद कर सकता है, पर किसी पड़ोसी को भुगतान का आदेश नहीं दे सकता। धारा 19 में अधिनियम के समझौते के लिए पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित लिखित सहमति और मध्यस्थ का प्रमाणीकरण शामिल है। किसी उपबंध को लागू उपचार मानकर उस पर निर्भर होने से पहले प्रवर्तन संबंधी जानकारी पढ़ें।
अभ्यास प्रश्न
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प्रवर्तन और परिषद: अलग सरकारी सूचनाएँ
9 अक्टूबर 2023 की सूचना धाराएँ 1, 3, 26, 31–38, 45–47, 50–54 और 56–57 शामिल करती है, पूरा अधिनियम नहीं। खाली प्रवर्तन रिकॉर्ड बाद की सूचनाओं के अभाव का प्रमाण नहीं है।
का.आ. 4384(अ): प्रवर्तन सूचना27 अगस्त 2026 की सूचना धारा 31(1) के अधीन दिल्ली स्थित प्रधान कार्यालय वाली भारतीय मध्यकता परिषद स्थापित करती है। यह सभी प्रक्रिया संबंधी धाराओं की प्रवर्तन सूचना नहीं है।
का.आ. 4781(अ): परिषद स्थापनाशैक्षिक संदर्भ, व्यक्तिगत कानूनी सलाह या प्रमाणित संस्करण नहीं। किसी उपचार पर निर्भर होने से पहले सरकारी पाठ, लागू नियम और संबंधित प्रावधान की प्रवर्तन सूचना जाँचें।