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TPA धारा 76: सकब्जा बन्धकदार का दायित्व

संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 · अध्याय 4: स्थावर संपत्ति के बंधक और भार

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76. सकब्जा बन्धकदार का दायित्व -

जबकि बन्धक चालू रहने के दौरान बधकदार बंधक सम्पत्ति का कब्जा ले लेता है, तब-

(क) उसको उस 'सम्पत्ति' का प्रबन्ध उस प्रकार करना होगा जैसा मामूली प्रज्ञा वाला व्यक्ति उसका प्रबंध करता, यदि वह उसकी अपनी होती;

(ख) उसको उस सम्पत्ति के भाटकों और लाभों को वसूल करने में अपने सर्वोत्तम प्रयास करने होंगे;

(ग) तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो उसे सरकारी राजस्व, लोक-प्रकृति के सब अन्य प्रभार और ऐसे कब्जे के दौरान तत्सम्बन्धी प्रोद्भवमान शोध्य सब भाटक और भाटक की ऐसी कोई बकाया, जिसका संदाय करने में व्यत्तिक्रम होने पर वह सम्पत्ति संक्षेपतः बेची जा सके, उस सम्पत्ति की आय में से देनी होगी;

(घ) तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो, उसे उस सम्पत्ति की ऐसी आवश्यक मरम्मत करानी होगी जिसके लिए वह उस सम्पत्ति के भाटकों और लाभों में से खण्ड (ग) में वर्णित संदायों की और मूलधन पर ब्याज की कटौती करने के पश्चात् उन भाटकों और लाभों में से, संदाय कर सकता हो;

(ङ) वह ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जो सम्पत्ति के लिए विनाशक या स्थायी रूप से क्षतिकर हों;

(च) जहाँ कि उसने सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी भाग का हानि या नुकसान के लिए जो अग्नि से हो, बीमा कराया है, वहाँ ऐसी हानि या नुकसान होने पर, उसे ऐसा कोई धन, जिसे वह पालिसी के अधीन वस्तुतः प्राप्त करता है या उसमें से इतना, जितना आवश्यक हो, सम्पत्ति के यथापूर्वकरण में, अथवा यदि बंधककर्ता ऐसा निदेश दे तो बन्धक धन के घटाने या भुगतान में उपयोजित करना होगा;

(छ) बंधकदार की हैसियत में उस द्वारा प्राप्त और खर्च की गयी सब राशियों का स्पष्ट, पूरा और शुद्ध लेखा उसे रखना होगा और बन्धक के चालू रहने के दौरान में किसी भी समय बंधककर्ता को उसके निवेदन और खर्च पर ऐसे लेखाओं की और ऐसे वाउचरों की, जिनसे वे समर्थित हों, सही प्रतियाँ देनी होंगी;

(ज) बंधक सम्पत्ति से उसे हुई प्राप्तियाँ, या जहाँ कि ऐसी सम्पत्ति उसके वैयक्तिक अधिभोग में है, वहाँ उस सम्पत्ति के बारे में उचित अधिभोग-भाटक, उस सम्पत्ति के प्रबन्ध के लिए और भाटकों और लाभों के संग्रहण के लिए समुचित रूप से उपगत व्ययों को और अन्य व्ययों को, जो खण्ड (ग) और (घ) में वर्णित हैं। तथा उन पर के ब्याज को काट लेने के पश्चात् उस रकम को (यदि कोई हो), जो समय-समय पर ब्याज मद्धे शोध्य हो, कम करने में और ऐसी प्राप्तियाँ, जितनी शोध्य ब्याज से अधिक हो, बंधक-धन के घटाने या भुगतान में उसके प्रति विकलित की जाएगी और अधिशेष, यदि कोई हो, बंधककर्ता को दे दिया जाएगा;

(झ) जबकि बंधककर्ता बंधक पर तत्समय शोध्य रकम निविदत्त करता है या एतस्मिनपश्चात् उपबन्धित प्रकार से निक्षिप्त करता है, तब बंधकदार बंधक सम्पत्ति से, यथास्थिति, निविदा की तारीख से या उस पूर्वतम समय से, जब वह न्यायालय से ऐसी रकम निकाल सकता था, अपने को हुई प्राप्तियों का लेखा इस धारा के अन्य खंडों में के उपबंधों के होते हुए भी देगा और वह ऐसी तारीख या समय के पश्चात् किए गए बंधक-सम्पत्ति संबंधी किन्हीं भी व्ययों मद्दे, कोई रकम उनमें से काटने का हकदार नहीं होगा।

उसकेव्यत्तिक्रमकेकारणहुईहानि- यदि बंधकदार इस धारा द्वारा अपने पर अधिरोपित कर्तव्यों में से किसी का पालन करने में असफल रहे, तो ऐसी असफलता के कारण हुई हानि, यदि कोई हो, उस समय, जब इस अध्याय के अधीन की गयी किसी डिक्री के अनुसरण में लेखा लिया जाए, उसके प्रति विकलित की जा सकेगी।

आधिकारिक संदर्भ: भारत सरकार का हिंदी संदर्भ पाठ — जाँच की तारीख: 30 सितंबर 2026.अध्ययन के लिए Banaka का संपादित हिंदी पाठ, आधिकारिक समेकित संस्करण नहीं। पठनीय कानूनी HTML और सरकारी हिंदी संदर्भ से तैयार किया गया है; संख्या और संदर्भ की त्रुटियाँ सुधारी गई हैं। यह केंद्रीय पाठ है; राज्य संशोधन, क्षेत्रीय अधिसूचनाएँ और अन्य लागू कानून अलग देखें। जाँच की तारीख स्रोत-संस्करण की तारीख नहीं है।मूल अनुसूची और संशोधन टिप्पणियाँ देखें

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