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TPA धारा 69A: रिसीवर की नियुक्ति

संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 · अध्याय 4: स्थावर संपत्ति के बंधक और भार

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69क. रिसीवर की नियुक्ति -

(1) धारा 69 के अधीन विक्रय की शक्ति के प्रयोग का अधिकार रखने वाले बन्धकदार को, उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन यह हक होगा कि वह बन्धक सम्पत्ति या उसके किसी भाग की आय का रिसीवर अपने द्वारा या अपनी ओर से हस्ताक्षरित लेख द्वारा नियुक्त करे।

(2) जो व्यक्ति रिसीवर के रूप में कार्य करने के लिए बन्धक विलेख में नामित है और उस रूप में कार्य करने के लिए रजामन्द और योग्य है, वह बन्धकदार द्वारा नियुक्त किया जा सकेगा।

यदि कोई भी व्यक्ति ऐसे नामित न किया गया हो या यदि सब नामित व्यक्ति कार्य करने के लिए अयोग्य हों या रजामन्द न हों या मर चुके हों, तो बन्धकदार ऐसे किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगा जिसकी नियुक्ति के लिए बन्धककर्त्ता भी सहमत हो, ऐसी सहमति न होने पर बन्धकदार न्यायालय से रिसीवर की नियुक्ति करने के लिए आवेदन करने का हकदार होगा और न्यायालय द्वारा नियुक्त कोई भी व्यक्ति बन्धकदार द्वारा सम्यक् रूप से नियुक्त किया गया समझा जाएगा।

रिसीवर किसी समय भी ऐसे लेख द्वारा, जो बन्धककर्त्ता और बन्धकदार द्वारा या उनकी ओर से हस्ताक्षरित हो, अथवा दोनों में से किसी पक्षकार द्वारा आवेदन पर और सम्यक् हेतुक दर्शित किए जाने पर न्यायालय द्वारा हटाया जा सकेगा।

रिसीवर का पद खाली होने पर उसकी पूर्ति इस उपधारा के उपबन्धों के अनुकूल की जा सकेगी।

(3) इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अधीन नियुक्त रिसीवर बन्धककर्ता का अभिकर्ता समझा जाएगा तथा रिसीवर के कार्यों या व्यत्तिक्रमों के लिए बन्धककर्त्ता अकेले ही उत्तरदायी होगा जब तक कि बन्धक-विलेख में अन्यथा उपबन्धित न हो या जब तक कि ऐसे कार्य या व्यत्तिक्रम बन्धकदार के अनुचित मध्यक्षेप के कारण न हुए हों।

(4) रिसीवर का यह शक्ति होगी कि वह उस समस्त आय की जिसके लिए वह रिसीवर नियुक्त किया गया है उस हित के जिसका व्ययन बन्धककर्त्ता कर सकता था, पूरे विस्तार तक माँग और वसूली या तो बन्धककर्ता के या बन्धकदार के नाम में वाद लाकर या निष्पादन करा के या अन्यथा करे और उसके लिए तनुकूल विधिमान्य रसीदें दे और ऐसी किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करे जो उसको बन्धकदार द्वारा इस धारा के उपबन्धों के अनुकूल प्रत्यायोजित हों।

(5) रिसीवर को धन देने वाले व्यक्ति की यह जाँच करने की आवश्यकता नहीं है कि रिसीवर की नियुक्ति विधिमान्य थी या नहीं।

(6) रिसीवर का यह हक होगा कि वह उसे प्राप्त समस्त धन की रकम पर कमीशन पाँच प्रतिशत से अनधिक ऐसी दर से जैसी उसकी नियुक्ति-पत्र में विनिर्दिष्ट है और यदि कोई दर ऐसे विनिर्दिष्ट न हो तो उस कुल रकम पर पाँच प्रतिशत की दर से या ऐसी अन्य दर से, जैसी न्यायालय रिसीवर द्वारा उस प्रयोजन के लिए किए गए आवेदन पर अनुज्ञात करना ठीक समझे, उस किसी रकम में से; जो उसे प्राप्त हुई है अपने पारिश्रमिक के लिए और रिसीवर के तौर पर स्वयं द्वारा उपगत सब खर्चो, प्रभारों और व्ययों की तुष्टि के लिए रख ले।

(7) यदि रिसीवर को बन्धकदार द्वारा ऐसा करने के लिए लिखित निदेश दिया जाए, तो रिसीवर बन्धक सम्पत्ति या उसके किसी भाग का, जो प्रकृत्या बीमा कराने योग्य है, हानि या नुकसान के लिए, जो अग्नि से हो, उस मात्रा तक, यदि कोई हो, जिस तक बन्धकदार ने उसका बीमा कराया होता, उस धन में से, जो उसे प्राप्त हुआ है, बीमा कराएगा और उसे बीमाकृत रखेगा।

(8) बीमा-धन के उपयोजन के बारे में इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रिसीवर अपने द्वारा प्राप्त सब धन को निम्न प्रकार से उपयोजित करेगा; अर्थात्-

(i) बंधक-सम्पत्ति पर पड़ने वाले सब भाटकों, करों, भू-राजस्व, रेटों, निर्गमों के, चाहे वे कैसे हो क्यों न हों, भुगतान में;

(ii) जिस बंधक के अधिकार के बारे में वह रिसीवर है उस बन्धक से पूर्विकता रखने वाली सब वार्षिक राशियों या अन्य संदायों की और सब मूल राशियों पर ब्याज को नीचा रखने में;

(iii) अपने कमीशन के और अग्नि, जीवन या अन्य प्रकार के बीमाओं के, यदि कोई हों, प्रीमियमों के, जो बंधक-विलेख के अधीन या इस अधिनियम के अधीन उचित तौर पर देय है, और बन्धकदार द्वारा लिखित रूप में निर्दिष्ट आवश्यक या उचित मरम्मत में हुए खर्चे के संदाय में;

(iv) बंधक के अधीन शोध्य होने वाले ब्याज के संदाय में;

(v) मूलधन के भुगतान में या उस मद्धे यदि बंधकदार द्वारा वह ऐसा करने के लिए लिखित रूप में निर्दिष्ट हो; और जो धन उसे प्राप्त हुआ है, उसकी अवशिष्टि, यदि कोई हो, उस व्यक्ति को देगा, जो यदि रिसीवर का कब्जा न होता, तो उस आय को प्राप्त करने का हकदार होता जिसका वह रिसीवर नियुक्त किया गया है या जो बंधक सम्पत्ति का अन्यथा हकदार है।

(9) उपधारा (1) के उपबन्ध केवल तब और वहीं तक लागू होते हैं, जब और जहाँ तक कि बन्धक- विलेख में कोई तत्प्रतिकूल आशय अभिव्यक्त नहीं किया गया है, और उपधारा (3) से (8) तक के, जिनके अन्तर्गत दोनों उपधाराएँ हैं, उपबन्धों में फेरफार या विस्तारण, बंधक-विलेख द्वारा किए जा सकेंगे और वे उपबन्ध इस प्रकार फेरफार या विस्तारण किए गए रूप में यावत्रशक्य उसी प्रकार से और वैसी ही सब प्रसंगतियों, प्रभावों और परिणामों के सहित प्रवर्तित होंगे मानो ऐसे फेरफार या विस्तारण उक्त उपधाराओं में अन्तर्विष्ट थे।

(10) बंधक-सम्पत्ति के प्रबन्ध या प्रशासन विषयक किसी वर्तमान प्रश्न पर, जो ऐसे कठिनाइपूर्ण या महत्वपूर्ण प्रश्नों से भिन्न हो, जिनके बारे में न्यायालय की राय हो कि वे संक्षिप्त निपटारे के लिए उचित नहीं हैं, न्यायालय की राय सलाह या निदेश के लिए न्यायालय से आवेदन वाद संस्थित किए बिना किया जा सकेगा। आवेदन में हितबद्ध व्यक्तियों में से उन पर, जिन्हें न्यायालय इस संबंध में ठीक समझे, आवेदन की प्रति की तामील कराई जाएगी और वे उसकी सुनवाई में हाजिर हो सकेंगे।

इस उपधारा के अधीन किए गए हर एक आवेदन के खर्चों का अधिनिर्णयन न्यायालय के विवेकाधीन होगा।

(11) इस धारा में 'न्यायालय' से वह न्यायालय अभिप्रेत है जिसे उस बंधक को प्रवर्तित कराने के बाद में अधिकारिता हो।

आधिकारिक संदर्भ: भारत सरकार का हिंदी संदर्भ पाठ — जाँच की तारीख: 30 सितंबर 2026.अध्ययन के लिए Banaka का संपादित हिंदी पाठ, आधिकारिक समेकित संस्करण नहीं। पठनीय कानूनी HTML और सरकारी हिंदी संदर्भ से तैयार किया गया है; संख्या और संदर्भ की त्रुटियाँ सुधारी गई हैं। यह केंद्रीय पाठ है; राज्य संशोधन, क्षेत्रीय अधिसूचनाएँ और अन्य लागू कानून अलग देखें। जाँच की तारीख स्रोत-संस्करण की तारीख नहीं है।मूल अनुसूची और संशोधन टिप्पणियाँ देखें

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