BNSS धारा 183: स्वीकारोक्ति और बयानों की रिकॉर्डिंग

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 · अध्याय 13: पुलिस को जानकारी और जांच करने की उनकी शक्तियां

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183. (1) उस जिले का कोई भी न्यायिक मजिस्ट्रेट जिसमें किसी अपराध के घटित होने की जानकारी दर्ज की गई है, चाहे उसके पास मामले में अधिकार क्षेत्र हो या नहीं, जांच के दौरान उसके सामने किए गए किसी भी स्वीकारोक्ति या बयान को रिकॉर्ड कर सकता है। इस अध्याय के तहत या किसी अन्य कानून के तहत जो फिलहाल लागू है, या उसके बाद किसी भी समय लेकिन जांच या परीक्षण शुरू होने से पहले:
बशर्ते कि इस उपधारा के तहत किया गया कोई भी कबूलनामा या बयान किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के वकील की उपस्थिति में भी दर्ज किया जा सकता है:
बशर्ते कि किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा कोई भी स्वीकारोक्ति दर्ज नहीं की जाएगी, जिस पर किसी भी समय लागू कानून के तहत मजिस्ट्रेट की कोई शक्ति प्रदान की गई हो।
(2) मजिस्ट्रेट, ऐसी किसी भी स्वीकारोक्ति को दर्ज करने से पहले, इसे करने वाले व्यक्ति को समझाएगा कि वह स्वीकारोक्ति करने के लिए बाध्य नहीं है और यदि वह ऐसा करता है, तो इसे उसके खिलाफ सबूत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है; और मजिस्ट्रेट ऐसी किसी भी स्वीकारोक्ति को तब तक रिकॉर्ड नहीं करेगा जब तक कि इसे करने वाले व्यक्ति से पूछताछ करने पर उसके पास यह विश्वास करने का कारण न हो कि यह स्वेच्छा से किया जा रहा है।
(3) यदि स्वीकारोक्ति दर्ज करने से पहले किसी भी समय, मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने वाला व्यक्ति कहता है कि वह बयान देने के लिए तैयार नहीं है, तो मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को पुलिस हिरासत में रखने के लिए अधिकृत नहीं करेगा।
(4) ऐसा कोई भी इकबालिया बयान किसी आरोपी व्यक्ति की जांच की रिकॉर्डिंग के लिए धारा 316 में प्रदान किए गए तरीके से दर्ज किया जाएगा और बयान देने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित किया जाएगा; और मजिस्ट्रेट ऐसे रिकॉर्ड के नीचे निम्नलिखित आशय का एक ज्ञापन देगा:—
"मैंने (नाम) को समझाया है कि वह स्वीकारोक्ति करने के लिए बाध्य नहीं है और यदि वह ऐसा करता है, तो वह जो भी स्वीकारोक्ति करेगा उसे उसके खिलाफ सबूत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और मेरा मानना है कि यह स्वीकारोक्ति स्वेच्छा से की गई थी। इसे मेरी उपस्थिति और सुनवाई में लिया गया था, और इसे बनाने वाले व्यक्ति को पढ़ा गया था और उसके द्वारा इसे सही माना गया था, और इसमें उसके द्वारा दिए गए बयान का पूरा और सच्चा विवरण शामिल है।
(हस्ताक्षरित) ए.बी.
मजिस्ट्रेट."

(5) उप-धारा (1) के तहत दिए गए किसी भी बयान (संस्वीकृति के अलावा) को इसके बाद साक्ष्य की रिकॉर्डिंग के लिए प्रदान की गई ऐसी तरीके से दर्ज किया जाएगा, जो न्यायिक मजिस्ट्रेट की राय में, परिस्थितियों के लिए सबसे उपयुक्त हो। मामला; और न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास उस व्यक्ति को शपथ दिलाने की शक्ति होगी जिसका बयान इस प्रकार दर्ज किया गया है।
(6) (ए) धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 70, धारा 71, धारा 73, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, उपधारा (1) या उपधारा के तहत दंडनीय मामलों में (2) धारा 74, या भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 78, न्यायिक मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति का बयान दर्ज करेगा जिसके खिलाफ ऐसा अपराध उप-धारा (5) में निर्दिष्ट तरीके से किया गया है, जैसे ही अपराध का घटित होना पुलिस के संज्ञान में लाया जाता है:
बशर्ते कि ऐसा बयान, जहां तक संभव हो, एक महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा और उसकी अनुपस्थिति में एक पुरुष न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा एक महिला की उपस्थिति में दर्ज किया जाएगा:
बशर्ते कि दस साल या उससे अधिक की कैद या आजीवन कारावास या मौत की सजा से दंडनीय अपराधों से संबंधित मामलों में, न्यायिक मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी द्वारा उसके सामने लाए गए गवाह का बयान दर्ज करेगा:
बशर्ते कि यदि बयान देने वाला व्यक्ति अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम है, तो मजिस्ट्रेट बयान दर्ज करने में दुभाषिया या विशेष शिक्षक की सहायता लेगा:
बशर्ते यह भी कि यदि बयान देने वाला व्यक्ति अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम है, तो दुभाषिया या विशेष शिक्षक की सहायता से व्यक्ति द्वारा दिया गया बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अधिमानतः सेल फोन के माध्यम से रिकॉर्ड किया जाएगा।< br>
(बी) किसी ऐसे व्यक्ति के खंड (ए) के तहत दर्ज किए गए बयान, जो अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम है, को मुख्य परीक्षा के बदले में एक बयान माना जाएगा, जैसा कि भारतीय साक्षा अधिनियम की धारा 142 में निर्दिष्ट है। 2023 ऐसा है कि बयान के निर्माता से ऐसे बयान पर जिरह की जा सकती है, परीक्षण के समय इसे रिकॉर्ड करने की आवश्यकता के बिना।
(7) इस धारा के तहत स्वीकारोक्ति या बयान दर्ज करने वाला मजिस्ट्रेट इसे उस मजिस्ट्रेट को अग्रेषित करेगा जिसके द्वारा मामले की जांच या सुनवाई की जानी है।

यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।

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