TPA धारा 109: पट्टाकर्त्ता के अन्तरिती के अधिकार
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 · अध्याय 5: स्थावर संपत्ति के पट्टे
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109. पट्टाकर्त्ता के अन्तरिती के अधिकार -
यदि पट्टाकर्त्ता पट्टे पर दी हुई सम्पत्ति को या उसके किसी भाग को या उसमें के अपने हित के किसी भाग को अन्तरित कर देता है तो अन्तरिती तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में उस अन्तरित सम्पत्ति या भाग के बारे में पट्टाकर्ता के वे सब अधिकार तब तक रखेगा और यदि पट्टेदार ऐसा निर्वाचन करे तो पट्टाकर्ता के सब दायित्वों के अध्यधीन तब तक रहेगा, जब तक वह उसका स्वामी रहता है, किन्तु पट्टाकर्ता का पट्टे द्वारा अपने पर अधिरोपित दायित्वों में से किसी के अध्यधीन रहना केवल ऐसे अन्तरण के कारण ही परिविरत न हो जाएगा जब तक कि पट्टेदार अन्तरिती को अपने प्रति दायी व्यक्ति मानने का निर्वाचन न कर ले:
परन्तु अन्तरिती अन्तरण से पहले के भाटक के शोध्य बकायों का हकदार नहीं है, और यदि पट्टेदार यह विश्वास करने का कारण न रखते हुए कि ऐसा अन्तरण किया गया है, पट्टाकर्ता को भाटक दे देता है, तो पट्टेदार अन्तरिती को ऐसा भाटक पुनः देने का दायी न होगा।
पट्टाकर्ता अन्तरिती और पट्टेदार यह अवधारित कर सकेंगे कि पट्टे द्वारा आरक्षित प्रीमियम या भाटक का कौन-सा अनुपात इस प्रकार अन्तरित भाटक के लिए देय है और उनमें असहमति होने की दशा में ऐसा अवधारण ऐसे किसी भी न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा जो पट्टे पर दी गई सम्पत्ति के कब्जे के लिए वाद को ग्रहण करने की अधिकारिता रखता हो।
आधिकारिक संदर्भ: भारत सरकार का हिंदी संदर्भ पाठ — जाँच की तारीख: 30 सितंबर 2026.अध्ययन के लिए Banaka का संपादित हिंदी पाठ, आधिकारिक समेकित संस्करण नहीं। पठनीय कानूनी HTML और सरकारी हिंदी संदर्भ से तैयार किया गया है; संख्या और संदर्भ की त्रुटियाँ सुधारी गई हैं। यह केंद्रीय पाठ है; राज्य संशोधन, क्षेत्रीय अधिसूचनाएँ और अन्य लागू कानून अलग देखें। जाँच की तारीख स्रोत-संस्करण की तारीख नहीं है।मूल अनुसूची और संशोधन टिप्पणियाँ देखें
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इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 105. पट्टे की परिभाषा
- 106. लिखित संविदा या स्थानीय प्रथा के अभाव में कुछ पट्टों की कालावधि
- 107. पट्टे कैसे किए जाते हैं
- 108. पट्टाकर्त्ता और पट्टेवार के अधिकार और दायित्व
- 110. उस दिन का अपवर्जन जिससे अवधि का प्रारम्भ होता है
- 111. पट्टे का पर्यवसान
- 112. समपहरण का अधित्यजन
- 113. छोड़ देने की सूचना का अधित्यजन
- 114. भाटक का संदाय न करने के कारण समपहरण से मुक्ति
- 114A. कुछ अन्य दशाओं में समपहरण से मुक्ति
- 115. अभ्यर्पण और समपहरण का उपपट्टों पर प्रभाव
- 116. अतिधारण का प्रभाव
- 117. कृषि-प्रयोजनों वाले पट्टों को छूट