BNSS धारा 163: उपद्रव या आशंकित खतरे के अत्यावश्यक मामलों में आदेश जारी करने की शक्ति

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 · अध्याय 11: सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखना

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163. (1) ऐसे मामलों में, जहां जिला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट या इस संबंध में राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त किसी अन्य कार्यकारी मजिस्ट्रेट की राय में, इस धारा के तहत कार्यवाही करने और तत्काल रोकथाम के लिए पर्याप्त आधार है या शीघ्र उपचार वांछनीय है, ऐसे मजिस्ट्रेट, मामले के भौतिक तथ्यों को बताते हुए और धारा 153 द्वारा प्रदान किए गए तरीके से दिए गए एक लिखित आदेश द्वारा, किसी भी व्यक्ति को एक निश्चित कार्य से दूर रहने या कुछ संपत्ति के संबंध में कुछ आदेश लेने का निर्देश दे सकते हैं। उसके कब्जे में या उसके प्रबंधन के तहत, यदि ऐसा मजिस्ट्रेट मानता है कि इस तरह के निर्देश से कानूनी रूप से नियोजित किसी भी व्यक्ति को बाधा, परेशानी या चोट लगने या मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा के लिए खतरा या जनता की अशांति को रोकने की संभावना है या रोकने की प्रवृत्ति है। शांति, या दंगा, या झगड़ा।
(2) इस धारा के तहत एक आदेश, आपातकाल के मामलों में या ऐसे मामलों में जहां परिस्थितियां उस व्यक्ति को, जिसके खिलाफ आदेश दिया गया है, नोटिस के नियत समय में तामील करने की अनुमति नहीं देती है, एकपक्षीय रूप से पारित किया जा सकता है।
(3) इस धारा के तहत एक आदेश किसी विशेष व्यक्ति, या किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों, या आम तौर पर किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में बार-बार आने या जाने पर जनता को निर्देशित किया जा सकता है।
(4) इस धारा के तहत कोई भी आदेश इसके बनने से दो महीने से अधिक समय तक लागू नहीं रहेगा:
बशर्ते कि यदि राज्य सरकार मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा के लिए खतरे को रोकने या दंगा या किसी झगड़े को रोकने के लिए ऐसा करना आवश्यक समझती है, तो वह अधिसूचना द्वारा निर्देश दे सकती है कि इस धारा के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया आदेश बना रहेगा। उस तारीख से छह महीने से अधिक की ऐसी अतिरिक्त अवधि के लिए लागू, जिस दिन मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया आदेश समाप्त हो जाता, लेकिन ऐसे आदेश के लिए, जैसा कि उक्त अधिसूचना में निर्दिष्ट किया जा सकता है।
(5) कोई भी मजिस्ट्रेट, स्वयं के प्रस्ताव पर या किसी पीड़ित व्यक्ति के आवेदन पर, इस धारा के तहत स्वयं या उसके अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट या उसके पूर्ववर्ती कार्यालय द्वारा दिए गए किसी भी आदेश को रद्द या बदल सकता है।
(6) राज्य सरकार, या तो स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर, उप-धारा (4) के परंतुक के तहत उसके द्वारा दिए गए किसी भी आदेश को रद्द कर सकती है या बदल सकती है।
(7) जहां उप-धारा (5) या उप-धारा (6) के तहत एक आवेदन प्राप्त होता है, मजिस्ट्रेट, या राज्य सरकार, जैसा भी मामला हो, आवेदक को उसके सामने पेश होने का शीघ्र अवसर प्रदान करेगी या यह, या तो व्यक्तिगत रूप से या वकील द्वारा और आदेश के विरुद्ध कारण दिखाकर; और यदि मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार, जैसा भी मामला हो, आवेदन को पूरी तरह या आंशिक रूप से खारिज कर देता है, तो वह ऐसा करने के कारणों को लिखित रूप में दर्ज करेगा।

यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।

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