BNSS धारा 218: न्यायाधीशों और लोक सेवकों पर अभियोजन
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 · अध्याय 15: कार्यवाही शुरू करने के लिए आवश्यक शर्तें
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218. (1) जब कोई व्यक्ति जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या लोक सेवक है या था, जिसे सरकार द्वारा या उसकी मंजूरी के अलावा अपने कार्यालय से नहीं हटाया जा सकता है, उस पर किसी ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है जो उसके द्वारा कार्य करते समय या कथित रूप से किए जाने का आरोप है। अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करने के लिए, कोई भी न्यायालय लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 में अन्यथा प्रदान की गई पिछली मंजूरी को छोड़कर ऐसे अपराध का संज्ञान नहीं लेगा।
(ए) ऐसे व्यक्ति के मामले में जो, जैसा भी मामला हो, केंद्र सरकार के संघ के मामलों के संबंध में नियोजित है या कथित अपराध के समय नियोजित था;
(बी) ऐसे व्यक्ति के मामले में जो, जैसा भी मामला हो, किसी राज्य के मामलों के संबंध में, राज्य सरकार के नियोजित अपराध के समय नियोजित था या था:
बशर्ते कि जहां कथित अपराध उस अवधि के दौरान खंड (बी) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा किया गया था, जबकि संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा किसी राज्य में लागू थी, खंड (बी) इस प्रकार लागू होगा यदि अभिव्यक्ति के लिए "राज्य सरकार" उसमें घटित होने वाली अभिव्यक्ति "केंद्र सरकार" प्रतिस्थापित किया गया:
बशर्ते कि ऐसी सरकार मंजूरी के लिए अनुरोध की प्राप्ति की तारीख से एक सौ बीस दिनों की अवधि के भीतर निर्णय लेगी और यदि वह ऐसा करने में विफल रहती है, तो मंजूरी ऐसी सरकार द्वारा प्रदान की गई मानी जाएगी। :
बशर्ते कि धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75 के तहत कथित किसी अपराध के आरोपी लोक सेवक के मामले में किसी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी। , धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79, धारा 143, धारा 199 या भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 200।
(2) कोई भी न्यायालय केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी के अलावा, संघ के सशस्त्र बलों के किसी भी सदस्य द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते समय या कार्य करने के लिए कथित रूप से किए गए किसी भी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा।
(3) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, निर्देश दे सकती है कि उप-धारा (2) के प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव के लिए लगाए गए बलों के सदस्यों के ऐसे वर्ग या श्रेणी पर लागू होंगे जैसा कि उसमें निर्दिष्ट किया जा सकता है, जहां भी वे सेवारत हो सकता है, और उसके बाद उस उप-धारा के प्रावधान "केंद्र सरकार" अभिव्यक्ति के लिए लागू होंगे; उसमें घटित होने वाली अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" प्रतिस्थापित किए गए।
(4) उप-धारा (3) में किसी भी बात के बावजूद, कोई भी न्यायालय किसी राज्य में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आरोपित बलों के किसी भी सदस्य द्वारा कार्य करते समय या कार्य करने के लिए कथित रूप से किए गए किसी भी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा। उस अवधि के दौरान अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में, जब केंद्र सरकार की पिछली मंजूरी को छोड़कर, संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के तहत जारी एक उद्घोषणा वहां लागू थी।
(5) केंद्र सरकार या राज्य सरकार, उस व्यक्ति का निर्धारण कर सकती है जिसके द्वारा, जिस तरीके से, और उस अपराध या अपराध के लिए, ऐसे न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या लोक सेवक के खिलाफ मुकदमा चलाया जाना है, और निर्दिष्ट कर सकती है। वह न्यायालय जिसके समक्ष मुकदमा चलाया जाना है।
यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।
इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 210. मजिस्ट्रेट द्वारा अपराधों का संज्ञान
- 211. आरोपी के आवेदन पर स्थानांतरण
- 212. मामलों को मजिस्ट्रेट को सौंपना
- 213. सत्र न्यायालय द्वारा अपराधों का संज्ञान
- 214. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अपने अधीन किए गए मामलों की सुनवाई करेंगे
- 215. लोक सेवकों के वैध अधिकार की अवमानना के लिए अभियोजन, धारा लोक न्याय के खिलाफ अपराधों के लिए और साक्ष्य में दिए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन
- 216. धमकी आदि के मामले में गवाहों के लिए प्रक्रिया
- 217. राज्य के खिलाफ अपराध और ऐसे अपराध करने के लिए आपराधिक साजिश के लिए अभियोजन
- 219. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन
- 220. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत अपराधों का अभियोजन
- 221. अपराध का संज्ञान
- 222. मानहानि का मुकदमा