BNSS धारा 480: गैर-जमानती अपराध के मामले में जमानत कब ली जा सकती है
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 · अध्याय 35: जमानत और बांड के संबंध में प्रावधान
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480. (1) जब किसी गैर-जमानती अपराध के आरोपी या संदिग्ध व्यक्ति को किसी पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार किया जाता है या हिरासत में लिया जाता है या उच्च न्यायालय के अलावा किसी अन्य न्यायालय के समक्ष पेश किया जाता है या लाया जाता है न्यायालय या सत्र न्यायालय, उसे जमानत पर रिहा किया जा सकता है, लेकिन—
(i) ऐसे व्यक्ति को रिहा नहीं किया जाएगा यदि यह मानने के लिए उचित आधार दिखाई देते हैं कि वह मौत या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध का दोषी है;
(ii) ऐसे व्यक्ति को रिहा नहीं किया जाएगा यदि ऐसा अपराध एक संज्ञेय अपराध है और उसे पहले मौत, आजीवन कारावास या सात साल या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था, या उसे पहले दो या दो मामलों में दोषी ठहराया गया था। तीन साल या उससे अधिक लेकिन सात साल से कम कारावास से दंडनीय संज्ञेय अपराध के अधिक अवसर:
बशर्ते कि न्यायालय यह निर्देश दे सकता है कि खंड (i) या खंड (ii) में निर्दिष्ट व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया जाए यदि ऐसा व्यक्ति बच्चा है या महिला है या बीमार या अशक्त है:
बशर्ते कि न्यायालय यह भी निर्देश दे सकता है कि खंड (ii) में निर्दिष्ट व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया जाए यदि वह संतुष्ट है कि किसी अन्य विशेष कारण से ऐसा करना उचित और उचित है:
बशर्ते यह भी कि केवल यह तथ्य कि किसी आरोपी व्यक्ति को जांच के दौरान गवाहों द्वारा पहचाने जाने या पहले पंद्रह दिनों से अधिक समय तक पुलिस हिरासत की आवश्यकता हो सकती है, जमानत देने से इनकार करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं होगा यदि वह अन्यथा जमानत पर रिहा होने का हकदार है और यह वचन देता है कि वह न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करेगा:
बशर्ते कि कोई भी व्यक्ति, यदि उसके द्वारा किया गया कथित अपराध मृत्युदंड, आजीवन कारावास, या सात साल या अधिक के कारावास से दंडनीय है, तो इस उपधारा के तहत न्यायालय द्वारा अवसर दिए बिना जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा। लोक अभियोजक को सुनवाई की.
(2) यदि, जैसा भी मामला हो, जांच, पूछताछ या मुकदमे के किसी भी चरण में ऐसे अधिकारी या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि यह मानने के लिए उचित आधार नहीं हैं कि अभियुक्त ने गैर-जमानती अपराध किया है, लेकिन यह है कि उसके अपराध की आगे की जांच के लिए पर्याप्त आधार हैं, तो आरोपी को, धारा 494 के प्रावधानों के अधीन और ऐसी जांच लंबित रहने तक, जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, या, ऐसे अधिकारी या न्यायालय के विवेक पर, उसके द्वारा एक बांड के निष्पादन पर रिहा किया जाएगा। उसकी उपस्थिति के लिए जैसा कि इसके बाद प्रदान किया गया है।
(3) जब किसी व्यक्ति पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अध्याय VI, अध्याय VII या अध्याय XVII के तहत सात साल या उससे अधिक तक की सजा या दंडनीय अपराध का आरोप या आरोप लगाया जाता है या उकसाया जाता है, या ऐसा कोई अपराध करने की साजिश या प्रयास, उप-धारा (1) के तहत जमानत पर रिहा किया जाता है, अदालत शर्तें लगाएगी,—
(ए) कि ऐसा व्यक्ति इस अध्याय के तहत निष्पादित बांड की शर्तों के अनुसार उपस्थित होगा;
(बी) ऐसा व्यक्ति उस अपराध के समान कोई अपराध नहीं करेगा जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है, या जिसके लिए उस पर संदेह किया गया है; और
(सी) ऐसा व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को कोई प्रलोभन, धमकी या वादा नहीं करेगा ताकि उसे अदालत या किसी पुलिस अधिकारी को ऐसे तथ्यों का खुलासा करने से रोका जा सके या सबूतों के साथ छेड़छाड़ की जा सके। , और न्याय के हित में, ऐसी अन्य शर्तें भी लगा सकता है जो वह आवश्यक समझे।
(4) उप-धारा (1) या उप-धारा (2) के तहत किसी भी व्यक्ति को जमानत पर रिहा करने वाला कोई अधिकारी या न्यायालय, ऐसा करने के अपने कारणों या विशेष कारणों को लिखित रूप में दर्ज करेगा।
(5) कोई भी न्यायालय जिसने किसी व्यक्ति को उप-धारा (1) या उप-धारा (2) के तहत जमानत पर रिहा किया है, यदि वह ऐसा करना आवश्यक समझता है, तो ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने और उसे हिरासत में लेने का निर्देश दे सकता है।
(6) यदि, मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय किसी भी मामले में, किसी गैर-जमानती अपराध के आरोपी व्यक्ति का मुकदमा मामले में साक्ष्य लेने के लिए निर्धारित पहली तारीख से साठ दिनों की अवधि के भीतर समाप्त नहीं होता है, तो ऐसा व्यक्ति, यदि वह उक्त अवधि के दौरान हिरासत में है, तो मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के लिए जमानत पर रिहा किया जा सकता है, जब तक कि लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों के लिए मजिस्ट्रेट अन्यथा निर्देश न दे।
(7) यदि, किसी भी समय, गैर-जमानती अपराध के आरोपी व्यक्ति के मुकदमे की समाप्ति के बाद और फैसला सुनाए जाने से पहले, न्यायालय की राय है कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि आरोपी दोषी नहीं है ऐसे किसी भी अपराध में, अभियुक्त को, यदि वह हिरासत में है, फैसले को सुनने के लिए उपस्थित होने के लिए बांड के निष्पादन पर रिहा कर दिया जाएगा।
यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।
इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 478. किन मामलों में जमानत लेनी चाहिए
- 479. अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन कैदी को हिरासत में लिया जा सकता है
- 481. जमानत के लिए आरोपी को अगले अपीलीय न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना होगा
- 482. गिरफ्तारी की आशंका वाले व्यक्ति को जमानत देने का निर्देश
- 483. जमानत के संबंध में उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय की विशेष शक्तियां
- 484. बांड की राशि और उसकी कटौती
- 485. अभियुक्तों और जमानतदारों का बांड
- 486. ज़मानतदारों द्वारा घोषणा
- 487. हिरासत से मुक्ति
- 488. पहली बार ली गई जमानत अपर्याप्त होने पर पर्याप्त जमानत का आदेश देने की शक्ति
- 489. ज़मानतदारों का उन्मोचन
- 490. मान्यता के बदले जमा
- 491. जब बांड जब्त कर लिया गया हो तो प्रक्रिया
- 492. बांड और जमानत बांड को रद्द करना
- 493. जमानतदार की मृत्यु के दिवालिया होने या बांड जब्त होने की स्थिति में प्रक्रिया
- 494. बच्चे से बांड आवश्यक है
- 495. धारा 491 के तहत आदेशों के खिलाफ अपील
- 496. कुछ निश्चित मान्यता पर देय राशि की वसूली का निर्देश देने की शक्ति