NI Act धारा 59: अनादर के या अतिशोध्य होने के पश्चात् अर्जित लिखत
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 · अध्याय 4: परक्रामण के विषय में
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¶59. अनादर के या अतिशोध्य होने के पश्चात् अर्जित लिखत—परक्राम्य लिखत के उस धारक को जिसने उसे अप्रतिग्रहण या असंदाय द्वारा उसके अनादर के पश्चात् उसकी सूचना सहित या परिपक्वता के पश्चात् अर्जित किया है, उस पर अन्य पक्षकारों के विरुद्ध केवल वे ही अधिकार प्राप्त हैं जो उसके अंतरक के थे :
¶सौकर्य पत्र या विपत्र—परन्तु जो कोई भी व्यक्ति सद्भावपूर्वक और प्रतिफलार्थ किसी ऐसे वचन-पत्र या विनिमय-पत्र का धारक उनकी परिपक्वता के पश्चात् हो जाता है जो प्रतिफल के बिना इस प्रयोजन से रचा, लिखा या प्रतिगृहीत किया गया था कि उसका कोई पक्षकार उसके आधार पर धन ले सकने के लिए समर्थ हो जाए वह किसी भी पूर्विक पक्षकार से उस वचन-पत्र या विनिमय- पत्र की रकम वसूल कर सकेगा ।
¶दृष्टांत
¶एक विनिमय-पत्र के प्रतिगृहीता ने उस समय, जब कि उसने उसे प्रतिगृहीत किया था, लेखीवाल के पास कुछ माल उस विनिमय-पत्र के संदाय के लिए साम्पार्श्विक प्रतिभूति के रूप में लेखीवाल को यह शक्ति देकर निक्षिप्त कर दिया था कि यदि उस विनिमय-पत्र की परिपक्वता पर विनिमय-पत्र का संदाय न किया जाए, तो वह माल को बेच दे और उसके आगमों को विनिमय-पत्र के चुकाने में लगा दे । परिपक्वता पर विनिमय-पत्र का संदाय न किए जाने पर लेखीवाल ने माल को बेच दिया, आगमों को प्रतिधृत कर लिया किन्तु विनिमय-पत्र क को पृष्ठांकित कर दिया । क का हक उसी आक्षेप के अध्यधीन है जिसके अध्यधीन लेखीवाल का हक है ।
आधिकारिक संदर्भ: India Code, भारत सरकार — आधिकारिक हिंदी PDF — स्रोत समीक्षा: 5 अक्टूबर 2026.दर्ज संस्करण / स्नैपशॉट की तारीख: 2026-10-05.आधिकारिक हिंदी PDF से Banaka का संदर्भ प्रतिलेख; प्रमाणित या अलग दिनांकित समेकित संस्करण नहीं। PDF के खराब कॉपी-पेस्ट अक्षर-मानचित्र को उसके फ़ॉन्ट और अक्षर-संयोजन से पुनर्प्राप्त किया गया है। पंक्ति-विन्यास, पादटिप्पणी संकेत और अलग संशोधन टिप्पणियाँ हटाई गई हैं; मूल शब्द, उदाहरण और प्रावधान सुरक्षित हैं। PDF के स्रोत-वर्तनी और विराम-चिह्न अनियमितताएँ बनी हैं। समीक्षा की तारीख संस्करण की तारीख नहीं है। धारा 2 और ऐतिहासिक अनुसूची निरसित हैं। मूल PDF और लागू न्यायिक व्याख्या साथ पढ़ें।मूल अनुसूची और संशोधन टिप्पणियाँ देखें
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इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 46. परिदान
- 47. परिदान द्वारा परक्रामण
- 48. पृष्ठांकन द्वारा परक्रामण
- 49. निरंक पृष्ठांकन का पूर्ण पृष्ठांकन में संपरिवर्तन
- 50. पृष्ठांकन का प्रभाव
- 51. परक्रामण कौन कर सकेगा
- 52. पृष्ठांकक जो अपने स्वयं के दायित्व को अपवर्जित करता है या सशर्त करता है
- 53. सम्यक्-अनुक्रम-धारक से हक व्युत्पन्न करने वाला धारक
- 54. निरंक पृष्ठांकित लिखत
- 55. निरंक पृष्ठांकन का पूर्ण पृष्ठांकन में संपरिवर्तन
- 56. शोध्य राशि के भाग के लिए पृष्ठांकन
- 57. मृतक द्वारा पृष्ठांकित लिखत को विधिक प्रतिनिधि केवल परिदान द्वारा परक्रामित नहीं कर सकता
- 58. विधिविरुद्ध साधनों द्वारा या विधिविरुद्ध प्रतिफलार्थ अभिप्राप्त लिखत
- 60. संदाय या तुष्टि होने तक लिखत परक्राम्य है