BSA धारा 8: सामान्य परिकल्पना के बारे में षड़यंत्रकारी द्वारा कही गई या की गई बातें
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 · अध्याय 2: तथ्यों की सुसंगति
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8. जहां कि यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि दो या अधिक व्यक्तियों ने अपराध या अनुयोज्य दोष करने के लिए मिलकर षड्यंत्र किया है, वहां उनके सामान्य आशय के बारे में उनमें से किसी एक व्यक्ति द्वारा उस समय के पश्चात्, जब ऐसा आशय उनमें से किसी एक ने प्रथम बार मन में धारण किया, कही की या लिखी गई कोई बात उन व्यक्तियों में से हर एक व्यक्ति के विरुद्ध, जिनके बारे में विश्वास किया जाता है कि उन्होंने इस प्रकार षड्यंत्र किया है, षड्यंत्र का अस्तित्व साबित करने के प्रयोजनार्थ उसी प्रकार सुसंगत तथ्य है जिस प्रकार यह दर्शित करने के प्रयोजनार्थ कि ऐसा कोई व्यक्ति उसका पक्षकार था ।
दृष्टांत
यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि क राज्य के विरुद्ध युद्ध करने के षड्यंत्र में सम्मिलित हुआ है ।
ख ने उस षड्यंत्र के प्रयोजनार्थ यूरोप में आयुध उपाप्त किए, ग ने वैसे ही उद्देश्य से कोलकाता में धन संग्रह किया, घ ने मुम्बई में लोगों को उस षड्यंत्र में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया, ङ ने आगरा में उस उद्देश्य के पक्षपोषण में लेख प्रकाशित किए और ग द्वारा कोलकाता में संगृहीत धन को च ने दिल्ली से छ के पास सिंगापुर भेजा । इन तथ्यों और उस षड्यंत्र का वृत्तान्त देने वाले झ द्वारा लिखित पत्र की अन्तर्वस्तु में से हर एक षड्यंत्र का अस्तित्व साबित करने के लिए तथा उसमें क की सह अपराधिता साबित करने के लिए भी सुसंगत है, चाहे वह उन सभी के बारे में अनभिज्ञ रहा हो और चाहे उन्हें करने वाले व्यक्ति उसके लिए अपरिचित रहे हों और चाहे वे उसके षड्यंत्र में सम्मिलित होने से पूर्व या उसके षड्यंत्र से अलग हो जाने के पश्चात् घटित हुए हों ।
यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।
इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 3. विवादयक तथ्यों और सुसंगत तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा
- 4. एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति
- 5. वे तथ्य, जो विवाद्यक तथ्यों या सुसंगत तथ्यों के प्रसंग, हेतुक या परिणाम हैं
- 6. हेतु, तैयारी और पूर्व का या पश्चात् का आचरण
- 7. विवादयक तथ्य या सुसंगत तथ्यों के स्पष्टीकरण या पुरःस्थापन के लिए आवश्यक तथ्य
- 9. वे तथ्य जो अन्यथा सुसंगत नहीं हैं कब सुसंगत हैं
- 10. रकम अवधारित करने के लिए न्यायालय को समर्थ करने की प्रवृति रखने वाले तथ्य नुकसानी के लिए वादों में सुसंगत हैं
- 11. जब कि अधिकार या रुढ़ि प्रश्नगत है, तब सुसंगत तथ्य
- 12. मन या शरीर की दशा या शारीरिक संवदेना का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य
- 13. कार्य आकस्मिक या साशय था इस प्रश्न पर प्रकाश डालने वाले तथ्य
- 14. कारबार के अनुक्रम का अस्तित्व कब सुसंगत है
- 15. स्वीकृति की परिभाषा
- 16. कार्यवाही के पक्षकार या उसके अभिकर्ता द्वारा स्वीकृति
- 17. उन व्यक्तियों द॒वारा स्वीकृतियां जिनकी स्थिति वाद के पक्षकारों के विरुदृध साबित की जानी चाहिए
- 18. वाद के पक्षकार द्वारा अभिव्यक्त रूप से निर्दिष्ट व्यक्तियों द्वारा स्वीकृतियां
- 19. स्वीकृतियों का उन्हें करने वाले व्यक्तियों के विरुदृध और उनके द्वारा या उनकी ओर से साबित किया जाना
- 20. दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु के बारे में मोँखिक स्वीकृतियां कब सुसंगत होती हैं
- 21. सिविल मामलों में स्वीकृतियां कब सुसंगत होती हैं
- 22. उत्प्रेरणा, धमकी, प्रपीड़न या वचन दूवारा कराई गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में कब विसंगत होती है
- 23. पुलिस अधिकारी से की गई संस्वीकृति
- 24. साबित संस्वीकृति को, जो उसे करने वाले व्यक्ति और एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचारित अन्य को प्रभावित करती है विचार में लेना
- 25. स्वीकृतियां निश्चायक सबूत नहीं हैं किंतु विबंध कर सकती हैं
- 26. वे दशाएं जिनमें उस व्यक्ति द्वारा सुसंगत तथ्य का किया गया कथन सुसंगत है, जो मर गया है या मिल नहीं सकता, इत्यादि
- 27. किसी साक्ष्य में कथित तथ्यों की सत्यता को पश्चातवर्ती कार्यवाही में साबित करने के लिए उस साक्ष्य की सुसंगति
- 28. लेखा-पुस्तकों की प्रविष्टियां कब सुसंगत हैं
- 29. कर्तव्य-पालन में की गई लोक अभिलेख या इलैक्ट्रानिकी अभिलेख की प्रविष्टियों की सुसंगति
- 30. मानचित्रों, चार्टों और रेखांकों के कथनों की सुसंगति
- 31. किन्हीं अधिनियमों या अधिसूचनाओं में अन्तर्विष्ट लोक प्रकृति के तथ्य के बारे में कथन की सुसंगति
- 32. विधि की पुस्तकों मैं अन्तर्विष्ट किसी विधि के कथनों की सुसंगति, जिसके अंतर्गत इलैक्ट्रानिक या डिजिटल प्ररूप भी हैं
- 33. कथन किसी बातचीत, दस्तावेज, इलैक्ट्रानिक अभिलेख, पुस्तक या पत्रों या कागज-पत्रों की आवली का भाग हो, तब क्या साक्ष्य दिया जाए
- 34. द्वितीय वाद या विचारण के वारणार्थ पूर्व निर्णय सुसंगत हैं
- 35. प्रोबेट इत्यादि विषयक अधिकारिता के किन्हीं निर्णयों की सुसंगति
- 36. धारा 35 में वर्णित से भिन्न निर्णयों, आदेशों या डिक्रियों की सुसंगति और प्रभाव
- 37. धारा 34, धारा 35 और धारा 36 में वर्णित से भिन्न निर्णय आदि कब सुसंगत हैं
- 38. निर्णय अभिप्राप्त करने में कपट या दुस्संधि या न्यायालय की अक्षमता साबित की जा सकेगी
- 39. विशेषज्ञों की रायें
- 40. विशेषज्ञों की रायों से संबंधित तथ्य
- 41. हस्तलेख और हस्ताक्षर के बारे मैं राय कब सुसंगत है
- 42. साधारण रूढ़ि या अधिकार के अस्तित्व के बारे में रायें कब सुसंगत हैं
- 43. प्रथाओं, सिद्धान्तों आदि के बारे में राये कब सुसंगत हैं
- 44. नातेदारी के बारे में राय कब सुसंगत है
- 45. राय के आधार कब सुसंगत हैं
- 46. सिविल मामलों में अध्यारोपित आचरण साबित करने के लिए शील विसंगत है
- 47. दाण्डिक मामलों में पूर्वतन अच्छा शील सुसंगत है
- 48. कतिपय मामलों में शील या पूर्व लैंगिक अनुभव के साक्ष्य का सुसंगत न होना
- 49. उत्तर मैं होने के सिवाय पूर्वतन बुरा शील सुसंगत नहीं है
- 50. नुकसानी पर प्रभाव डालने वाला शील