BSA धारा 12: मन या शरीर की दशा या शारीरिक संवदेना का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 · अध्याय 2: तथ्यों की सुसंगति
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12. मन की कोई भी दशा जैसे आशय, ज्ञान, सद्भाव, उपेक्षा, उतावलापन किसी विशिष्ट व्यक्ति के प्रति वैमनस्य या सदिच्छा दर्शित करने वाले या शरीर की या शारीरिक संवेदना की किसी दशा का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य तब सुसंगत हैं, जब कि ऐसी मन की या शरीर की या शारीरिक संवेदन की किसी ऐसी दशा का अस्तित्व विवाद्य या सुसंगत है ।
स्पष्टीकरण 1—जो तथ्य इस नाते सुसंगत हैं कि वह मन की सुसंगत दशा के अस्तित्व को दर्शित करता है उससे यह दर्शित होना ही चाहिए कि मन की वह दशा साधारणतः नहीं, अपितु प्रश्नगत विशिष्ट विषय के बारे में, अस्तित्व में है ।
स्पष्टीकरण 2—किन्तु जब कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विचारण में इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत उस अभियुक्त द्वारा किसी अपराध का कभी पहले किया जाना सुसंगत हो, तब ऐसे व्यक्ति की पूर्व दोषसिद्धियां भी सुसंगत तथ्य होंगी ।
दृष्टांत
(क) क चुराया हुआ माल यह जानते हुए कि वह चुराया हुआ है, प्राप्त करने का अभियुक्त है । यह साबित कर दिया जाता है कि उसके कब्जे में कोई विशिष्ट चुराई हुई चीज थी । यह तथ्य कि उसी समय उसके कब्जे में कई अन्य चुराई हुई चीजें थीं यह दर्शित करने की प्रवृत्ति रखने वाला होने के नाते सुसंगत है कि जो चीजें उसके कब्जे में थीं उनमें से हर एक और सब के बारे में वह जानता था कि वह चुराई हुई हैं ।
(ख) क पर किसी अन्य व्यक्ति को कूटकृत मुद्रा के कपटपूर्वक परिदान करने का अभियोग है, जिसे वह परिदान करते समय जानता था कि वह कूटकृत है । यह तथ्य कि उसके परिदान के समय क के कब्जे में वैसे ही दूसरे कूटकृत मुद्रा थीं, सुसंगत है । यह तथ्य कि क एक कूटकृत मुद्रा को, यह जानते हुए कि वह मुद्रा कूटकृत है, उसे असली के रूप में किसी अन्य व्यक्ति को परिदान करने के लिए पहले भी दोषसिद्ध हुआ था, सुसंगत है ।
(ग) ख के कुत्ते द्वारा, जिसका हिंस होना ख जानता था, किए गए नुकसान के लिए ख पर क वाद लाता है । ये तथ्य कि कुत्ते ने पहले, भ, म और य को काटा था और यह कि उन्होंने ख से शिकायतें की थीं, सुसंगत हैं ।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या विनिमयपत्र का प्रतिगृहीता क यह जानता था कि उसके पाने वाले का नाम काल्पनिक है । यह तथ्य कि क ने उसी प्रकार से लिखित अन्य विनिमयपत्रों को इसके पहले कि वे पाने वाले द्वारा, यदि पाने वाला वास्तविक व्यक्ति होता तो, उसको परेषित किए जा सकते, प्रतिगृहीत किया था, यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि क यह जानता था कि पाने वाला व्यक्ति काल्पनिक है ।
(ङ) क पर ख की ख्याति की अपहानि करने के आशय से एक लाइबल प्रकाशित करके ख की मानहानि करने का अभियोग है । यह तथ्य कि ख के बारे में क ने पूर्व प्रकाशन किए, जिनसे ख के प्रति क का वैमनस्य दर्शित होता है, इस कारण सुसंगत है कि उससे प्रश्नगत विशिष्ट प्रकाशन द्वारा ख की ख्याति की अपहानि करने का क का आशय साबित होता है । ये तथ्य कि क और ख के बीच पहले कोई झगड़ा नहीं हुआ और कि क ने परिवाददत्त बात को जैसा सुना था वैसा ही दुहरा दिया था, यह दर्शित करने के नाते कि क का आशय ख की ख्याति की अपहानि करना नहीं था, सुसंगत हैं ।
(च) ख द्वारा क पर यह वाद लाया जाता है कि ग के बारे में क ने ख से यह कपटपूर्वक व्यपदेशन किया कि ग शोधक्षम है जिससे उत्प्रेरित होकर ख ने ग का, जो दिवालिया था, भरोसा किया और हानि उठाई । यह तथ्य कि जब क ने ग को शोधक्षम व्यपदिष्ट किया था, तब ग को उसके पड़ोसी और उससे व्यौहार करने वाले व्यक्ति शोधक्षम समझते थे, यह दर्शित करने के नाते कि क ने व्यपदेशन सद्भावपूर्वक किया था, सुसंगत है ।
(छ) क पर ख उस काम की कीमत के लिए वाद लाता है जो ठेकेदार ग के आदेश से किसी गृह पर, जिसका क स्वामी है, ख ने किया था । क का प्रतिवाद है कि ख का ठेका ग के साथ था । यह तथ्य कि क ने प्रश्नगत काम के लिए ग को कीमत दे दी इसलिए सुसंगत है कि उससे यह साबित होता है कि क ने सद्भावपूर्वक ग को प्रश्नगत काम का प्रबन्ध दे दिया था, जिससे कि ख के साथ ग अपने ही निमित्त, न कि क के अभिकर्ता के रूप में, संविदा करने की स्थिति में था ।
(ज) क ऐसी सम्पत्ति का, जो उसने पड़ी पाई थी, बेईमानी से दुर्विनियोग करने का अभियुक्त है और प्रश्न यह है कि क्या जब उसने उसका विनियोग किया उसे सद्भावपूर्वक विश्वास था कि वास्तविक स्वामी मिल नहीं सकता । यह तथ्य कि सम्पत्ति के खो जाने की लोक सूचना उस स्थान में, जहां क था, दी जा चुकी थी, यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि क को सद्भावपूर्वक यह विश्वास नहीं था कि उस सम्पत्ति का वास्तविक स्वामी मिल नहीं सकता । यह तथ्य कि क यह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि सूचना कपटपूर्वक ग द्वारा दी गई थी जिसने संपत्ति की हानि के बारे में सुन रखा था और जो उसने उस पर मिथ्या दवा करना का इच्छुक था यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि क का सूचना के बारे में ज्ञान क के सद्भाव को नासाबित नहीं करता ।
(ड) क पर ख को मार डालने के आशय से उस पर असन करने का अभियोग है । क का आशय दर्शित करने के लिए यह तथ्य साबित किया जा सकेगा कि क ने पहले भी ख पर असन किया था ।
(ढ) क पर ख को धमकी भरे पत्र भेजने का आरोप है । इन पत्रों का आशय दर्शित करने के नाते क द्वारा ख को पहले भेजे गए धमकी भरे पत्र साबित किए जा सकेंगे ।
(ट) प्रश्न यह है कि क्या क अपनी पत्नी ख के प्रति क्रूरता का दोषी रहा है । अभिकथित क्रूरता के थोड़ी देर पहले या पीछे उनके एक दूसरे के प्रति भावना की अभिव्यक्तियां सुसंगत तथ्य हैं ।
(ठ) प्रश्न यह है कि क्या क की मृत्यु विष से कारित की गई थी । अपनी रुग्णावस्था में क द्वारा अपने लक्षणों के बारे में किए हुए कथन सुसंगत तथ्य हैं ।
(ड) प्रश्न यह है कि क के स्वास्थ्य की दशा उस समय कैसी थी जिस समय उसके जीवन का बीमा कराया गया था । प्रश्नगत समय पर या उसके लगभग अपने स्वास्थ्य की दशा के बारे में क द्वारा किए गए कथन सुसंगत तथ्य हैं ।
(ढ) क ऐसी उपेक्षा के लिए ख पर वाद लाता है जो ख ने उसे युक्तियुक्त रूप से अनुपयोग्य कार भाड़े पर देने द्वारा की, जिससे क को क्षति हुई थी । यह तथ्य कि उस विशिष्ट कार की त्रुटि की ओर अन्य अवसरों पर भी ख का ध्यान आकृष्ट किया गया था, सुसंगत है । यह तथ्य कि ख उन कारों के बारे में, जिन्हें वह भाड़े पर देता था, अभ्यासतः उपेक्षावान था, विसंगत है ।
(ण) क साशय असन द्वारा ख की मृत्यु करने के कारण हत्या के लिए विचारित है । यह तथ्य कि क ने अन्य अवसरों पर ख पर असन किया था, क का ख पर असन करने का आशय दर्शित करने के नाते सुसंगत है । यह तथ्य कि क लोगों पर उनकी हत्या करने के आशय से असन करने का अभ्यासी था, विसंगत है ।
(त) क का किसी अपराध के लिए विचारण किया जाता है । यह तथ्य कि उसने कोई बात कही जिससे उस विशिष्ट अपराध के करने का आशय उपदर्शित होता है, सुसंगत है । यह तथ्य कि उसने कोई बात कही जिससे उस प्रकार के अपराध करने की उसकी साधारण प्रवृत्ति उपदर्शित होती है, विसंगत है ।
यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।
इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 3. विवादयक तथ्यों और सुसंगत तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा
- 4. एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति
- 5. वे तथ्य, जो विवाद्यक तथ्यों या सुसंगत तथ्यों के प्रसंग, हेतुक या परिणाम हैं
- 6. हेतु, तैयारी और पूर्व का या पश्चात् का आचरण
- 7. विवादयक तथ्य या सुसंगत तथ्यों के स्पष्टीकरण या पुरःस्थापन के लिए आवश्यक तथ्य
- 8. सामान्य परिकल्पना के बारे में षड़यंत्रकारी द्वारा कही गई या की गई बातें
- 9. वे तथ्य जो अन्यथा सुसंगत नहीं हैं कब सुसंगत हैं
- 10. रकम अवधारित करने के लिए न्यायालय को समर्थ करने की प्रवृति रखने वाले तथ्य नुकसानी के लिए वादों में सुसंगत हैं
- 11. जब कि अधिकार या रुढ़ि प्रश्नगत है, तब सुसंगत तथ्य
- 13. कार्य आकस्मिक या साशय था इस प्रश्न पर प्रकाश डालने वाले तथ्य
- 14. कारबार के अनुक्रम का अस्तित्व कब सुसंगत है
- 15. स्वीकृति की परिभाषा
- 16. कार्यवाही के पक्षकार या उसके अभिकर्ता द्वारा स्वीकृति
- 17. उन व्यक्तियों द॒वारा स्वीकृतियां जिनकी स्थिति वाद के पक्षकारों के विरुदृध साबित की जानी चाहिए
- 18. वाद के पक्षकार द्वारा अभिव्यक्त रूप से निर्दिष्ट व्यक्तियों द्वारा स्वीकृतियां
- 19. स्वीकृतियों का उन्हें करने वाले व्यक्तियों के विरुदृध और उनके द्वारा या उनकी ओर से साबित किया जाना
- 20. दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु के बारे में मोँखिक स्वीकृतियां कब सुसंगत होती हैं
- 21. सिविल मामलों में स्वीकृतियां कब सुसंगत होती हैं
- 22. उत्प्रेरणा, धमकी, प्रपीड़न या वचन दूवारा कराई गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में कब विसंगत होती है
- 23. पुलिस अधिकारी से की गई संस्वीकृति
- 24. साबित संस्वीकृति को, जो उसे करने वाले व्यक्ति और एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचारित अन्य को प्रभावित करती है विचार में लेना
- 25. स्वीकृतियां निश्चायक सबूत नहीं हैं किंतु विबंध कर सकती हैं
- 26. वे दशाएं जिनमें उस व्यक्ति द्वारा सुसंगत तथ्य का किया गया कथन सुसंगत है, जो मर गया है या मिल नहीं सकता, इत्यादि
- 27. किसी साक्ष्य में कथित तथ्यों की सत्यता को पश्चातवर्ती कार्यवाही में साबित करने के लिए उस साक्ष्य की सुसंगति
- 28. लेखा-पुस्तकों की प्रविष्टियां कब सुसंगत हैं
- 29. कर्तव्य-पालन में की गई लोक अभिलेख या इलैक्ट्रानिकी अभिलेख की प्रविष्टियों की सुसंगति
- 30. मानचित्रों, चार्टों और रेखांकों के कथनों की सुसंगति
- 31. किन्हीं अधिनियमों या अधिसूचनाओं में अन्तर्विष्ट लोक प्रकृति के तथ्य के बारे में कथन की सुसंगति
- 32. विधि की पुस्तकों मैं अन्तर्विष्ट किसी विधि के कथनों की सुसंगति, जिसके अंतर्गत इलैक्ट्रानिक या डिजिटल प्ररूप भी हैं
- 33. कथन किसी बातचीत, दस्तावेज, इलैक्ट्रानिक अभिलेख, पुस्तक या पत्रों या कागज-पत्रों की आवली का भाग हो, तब क्या साक्ष्य दिया जाए
- 34. द्वितीय वाद या विचारण के वारणार्थ पूर्व निर्णय सुसंगत हैं
- 35. प्रोबेट इत्यादि विषयक अधिकारिता के किन्हीं निर्णयों की सुसंगति
- 36. धारा 35 में वर्णित से भिन्न निर्णयों, आदेशों या डिक्रियों की सुसंगति और प्रभाव
- 37. धारा 34, धारा 35 और धारा 36 में वर्णित से भिन्न निर्णय आदि कब सुसंगत हैं
- 38. निर्णय अभिप्राप्त करने में कपट या दुस्संधि या न्यायालय की अक्षमता साबित की जा सकेगी
- 39. विशेषज्ञों की रायें
- 40. विशेषज्ञों की रायों से संबंधित तथ्य
- 41. हस्तलेख और हस्ताक्षर के बारे मैं राय कब सुसंगत है
- 42. साधारण रूढ़ि या अधिकार के अस्तित्व के बारे में रायें कब सुसंगत हैं
- 43. प्रथाओं, सिद्धान्तों आदि के बारे में राये कब सुसंगत हैं
- 44. नातेदारी के बारे में राय कब सुसंगत है
- 45. राय के आधार कब सुसंगत हैं
- 46. सिविल मामलों में अध्यारोपित आचरण साबित करने के लिए शील विसंगत है
- 47. दाण्डिक मामलों में पूर्वतन अच्छा शील सुसंगत है
- 48. कतिपय मामलों में शील या पूर्व लैंगिक अनुभव के साक्ष्य का सुसंगत न होना
- 49. उत्तर मैं होने के सिवाय पूर्वतन बुरा शील सुसंगत नहीं है
- 50. नुकसानी पर प्रभाव डालने वाला शील