अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान

भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 12

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संस्कृत श्लोक

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥

हिंदी अर्थ

वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को (जिसको आसुरी संपदा के नाम से विस्तारपूर्वक भगवान ने गीता अध्याय 16 श्लोक 4 तथा श्लोक 7 से 21 तक में कहा है) ही धारण किए रहते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने उन लोगों की स्थिति का वर्णन किया है जो ईश्वर के ज्ञान और भक्ति से विमुख होकर आसुरी प्रवृत्तियों में लिप्त रहते हैं।

मोघाशा (व्यर्थ की आशाएं): ये लोग अपने जीवन में ऐसी इच्छाएं पालते हैं जो कभी पूरी नहीं होतीं। उनकी सभी इच्छाएं भौतिक और स्वार्थपरक होती हैं, और इस प्रकार वे कभी संतुष्ट नहीं होते।

मोघकर्माणो (व्यर्थ के कर्म): इनके कर्म भी अर्थहीन होते हैं। ये लोग जो भी कर्म करते हैं, उसका कोई स्थायी फल नहीं होता क्योंकि वे अज्ञान में डूबे रहते हैं और उनका उद्देश्य आत्मकल्याण नहीं होता।

मोघज्ञाना (व्यर्थ का ज्ञान): ऐसे लोग जिनका ज्ञान या तो अज्ञानी है या फिर भ्रामक है। वे सच्चे ज्ञान से वंचित रहते हैं और गलत धारणाओं में फंसे रहते हैं।

विचेतसः (अविवेकी): वे लोग जो विवेकहीन होते हैं, जो सही और गलत में भेद नहीं कर पाते।

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः (राक्षसी और आसुरी प्रकृति को अपनाना): ये लोग राक्षसी और आसुरी प्रकृति को अपना लेते हैं। ऐसी प्रकृति में हिंसा, क्रोध, अहंकार, और अन्य नकारात्मक गुण होते हैं, जो उन्हें मोह में डाल देते हैं और वे सत्य के मार्ग से भटक जाते हैं।

इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो लोग आत्मज्ञान, भक्ति, और सत्य के मार्ग से विमुख होते हैं, वे अपने जीवन में असंतोष और अज्ञान के कारण दुख पाते हैं। उनका मन आसुरी प्रवृत्तियों से घिरा रहता है, जो उन्हें और अधिक मोह और भ्रम में डाल देता है। इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि सच्चा सुख और शांति केवल ईश्वर की शरण में ही प्राप्त हो सकती है।