अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
( भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और दैवी प्रकृति वालों के भगवद्भजन का प्रकार )
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥
हिंदी अर्थ
मेरे परमभाव को (गीता अध्याय 7 श्लोक 24 में देखना चाहिए) न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान् ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अज्ञानी लोग (मूढ) मेरी मानव रूप को देखकर मुझे तुच्छ समझते हैं और मेरे दिव्य स्वरूप को नहीं पहचानते। वे यह नहीं समझ पाते कि मैं सृष्टि का स्वामी और परमेश्वर हूँ।
श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि जब वे पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में अवतरित होते हैं, तो मूर्ख लोग उन्हें केवल एक साधारण मनुष्य मानते हैं। वे उनके वास्तविक और उच्च स्वरूप को नहीं समझ पाते, जो कि संपूर्ण सृष्टि के स्वामी और पालनकर्ता हैं। श्रीकृष्ण का यह रूप मनुष्य के रूप में होते हुए भी, उनके असली दिव्य स्वरूप को नहीं मिटाता। वे सभी जीवों के भीतर निवास करने वाले और समस्त भूतों के महान ईश्वर हैं।
इसलिए, भगवान श्रीकृष्ण यहां यह संदेश दे रहे हैं कि उनकी सच्ची पहचान को जानना और समझना अत्यंत आवश्यक है। उनके बाहरी रूप को देखकर उनके वास्तविक दिव्य स्वरूप को नकारना अज्ञानता का लक्षण है। वे असल में परब्रह्म हैं, जो सब कुछ उत्पन्न करने वाले, पालन करने वाले और संहार करने वाले हैं।