अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान

भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 13

पूरा अध्याय पढ़ें

संस्कृत श्लोक

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।

भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम्‌॥

हिंदी अर्थ

परंतु हे कुन्तीपुत्र! दैवी प्रकृति के (इसका विस्तारपूर्वक वर्णन गीता अध्याय 16 श्लोक 1 से 3 तक में देखना चाहिए) आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "हे पार्थ (अर्जुन), महात्मा लोग, जो दैवीय प्रकृति को अपनाते हैं, मेरी भक्ति करते हैं। वे मुझे अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियों का आदिकारण मानते हुए अनन्य भाव से मेरी आराधना करते हैं।"

इसका अर्थ यह है कि जो महात्मा या सच्चे साधक होते हैं, वे दैवीय गुणों से संपन्न होते हैं और अपनी आत्मा को भगवान की ओर समर्पित करते हैं। वे संसार की भौतिक प्रकृति से ऊपर उठकर, भगवान की शरण में रहते हैं और उनकी भक्ति में लीन रहते हैं। उनका मन केवल भगवान में ही स्थित रहता है, और वे जानते हैं कि भगवान ही समस्त सृष्टि के आधार हैं और वे अविनाशी हैं। इस प्रकार, महात्मा लोग भौतिक सुख-सुविधाओं की अपेक्षा, आत्मा की शांति और भगवान की भक्ति में संलग्न रहते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण यहाँ महात्माओं की विशेषता को उजागर कर रहे हैं, जो दैवीय प्रकृति को अपनाकर भगवान की शरण में आ जाते हैं और पूर्ण समर्पण के साथ उनकी भक्ति में तल्लीन रहते हैं।