अध्याय 6: ध्यानयोग
भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥
हिंदी अर्थ
जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बता रहे हैं कि योग में उन्नति करने के लिए मनुष्य को अपने इन्द्रियों के विषयों और कर्मों में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।
"यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते" का अर्थ है कि जब कोई व्यक्ति इन्द्रियों के विषयों (जैसे स्वाद, गंध, स्पर्श, आदि) में या अपने कर्मों (जैसे भौतिक कार्यों, सामाजिक उत्तरदायित्वों, आदि) में आसक्त नहीं होता है।
"सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी" का मतलब है कि वह व्यक्ति जो सभी प्रकार के संकल्पों, इच्छाओं और कामनाओं को त्याग चुका है।
इस प्रकार, जब कोई व्यक्ति इन्द्रियों के विषयों और कर्मों से मुक्त होकर सभी प्रकार के संकल्पों और इच्छाओं का त्याग कर देता है, तब उसे "योगारूढ़" कहा जाता है। अर्थात, वह व्यक्ति जिसने योग में उच्च स्थिति प्राप्त कर ली है।
इस श्लोक में इस बात पर जोर दिया गया है कि योग की उच्च अवस्था प्राप्त करने के लिए बाहरी भौतिक सुखों और कर्मों में लिप्तता से मुक्त होना आवश्यक है। मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए, संकल्पों का त्याग करके, एक योगी ध्यानयोग की उच्चतम अवस्था में पहुँच सकता है।