अध्याय 6: ध्यानयोग

भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 3

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संस्कृत श्लोक

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥

हिंदी अर्थ

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण दो प्रकार के साधकों के लिए मार्गदर्शन देते हैं—जो योग की साधना की शुरुआत कर रहे हैं और जो पहले से ही योग में स्थिर हो चुके हैं।

1. आरूरूक्षोः मुनि: आरूरूक्षोः का अर्थ है 'वह जो योग में आरूढ़ होना चाहता है', यानी जो योग की साधना की शुरुआत करना चाहता है। ऐसे साधक के लिए कर्म (कर्मयोग) का पालन करना महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि प्रारंभिक साधक को निस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। कर्म योग के माध्यम से, साधक अपने मन को शुद्ध करता है और उसे योग के उच्च स्तरों के लिए तैयार करता है।

2. योगारूढ़: योगारूढ़ का अर्थ है 'वह जो पहले से ही योग में स्थिर हो चुका है', यानी जिसने पहले ही ध्यान और आत्मसंयम में निपुणता प्राप्त कर ली है। ऐसे साधक के लिए शम (मन की शांति) का अभ्यास करना महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि उसे बाहरी गतिविधियों से हटकर अपने मन को शांत करना चाहिए और ध्यान में स्थिर रहना चाहिए। यहाँ शम का तात्पर्य आत्म-संयम और मन की स्थिरता से है।

निष्कर्ष: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि योग के प्रारंभिक चरण में व्यक्ति को कर्म के माध्यम से योग की साधना करनी चाहिए, जबकि उन्नत अवस्था में पहुँचे हुए साधक के लिए मन की शांति और ध्यान ही साधना का मुख्य कारण होना चाहिए। इस प्रकार, योग की यात्रा में कर्म और शम दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है, और इन्हें साधक की अवस्था के अनुसार अपनाना चाहिए।