अध्याय 6: ध्यानयोग

भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 5

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संस्कृत श्लोक

( आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण )

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

हिंदी अर्थ

अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्म-संयम और आत्म-विकास की महत्ता के बारे में बता रहे हैं। यहाँ आत्मा का तात्पर्य हमारे भीतर की आत्मशक्ति या चेतना से है।

"उद्धरेदात्मनात्मानं" का अर्थ है - व्यक्ति को अपने मन और बुद्धि द्वारा स्वयं का उद्धार करना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपने जीवन के उत्थान के लिए अपने ही प्रयासों पर निर्भर रहना चाहिए। उसे अपनी क्षमता, योग्यता और संकल्प के बल पर खुद को आगे बढ़ाना चाहिए।

"नात्मानमवसादयेत्" का अर्थ है - मनुष्य को कभी भी अपने को गिराना या नीचा नहीं दिखाना चाहिए। उसे आत्म-निंदा से बचना चाहिए और आत्म-सम्मान को बनाए रखना चाहिए।

"आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः" - इसका मतलब है कि स्वयं की चेतना, ज्ञान और आत्मानुशासन से ही मनुष्य का सच्चा मित्र बनता है। जब हम अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हैं, तब हम अपने सबसे बड़े मित्र होते हैं।

"आत्मैव रिपुरात्मनः" - इसका अर्थ है कि जब मनुष्य अपने मन और इंद्रियों के नियंत्रण से बाहर होता है, तब वही उसका सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं और वासनाओं के वश में आ जाता है, तो वह अपने ही हाथों अपने जीवन को संकट में डाल देता है।

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि व्यक्ति को आत्म-नियंत्रण के माध्यम से अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाना चाहिए। आत्म-संयम और आत्म-प्रेरणा ही हमारे उद्धार के साधन हैं। अगर हम अपने विचारों और कर्मों पर नियंत्रण नहीं रखते, तो वही हमारे पतन का कारण बनते हैं। इसलिए, हमें अपने भीतर की शक्तियों को जागृत करके अपने उद्धार की ओर बढ़ना चाहिए।