अध्याय 6: ध्यानयोग
भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥
हिंदी अर्थ
हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि सच्चा संन्यास और योग दोनों ही एक ही साधना के दो पहलू हैं। जो व्यक्ति अपने मन के संकल्पों और इच्छाओं का त्याग कर देता है, वही असल में संन्यासी और योगी कहलाने का अधिकारी होता है। यहाँ 'संकल्प' का मतलब मन की इच्छाओं और भोगों की लालसा से है।
संन्यास का अर्थ है भौतिक वस्तुओं और इन्द्रियों के सुख से दूरी बनाना, लेकिन यह मात्र बाहरी रूप से नहीं होना चाहिए। असली संन्यास मन के स्तर पर होता है, जहां व्यक्ति अपने मन की इच्छाओं को नियंत्रित कर लेता है।
योग का भी यही अर्थ है - मन और इन्द्रियों का संयम और आत्मा से एकात्मकता की प्राप्ति। इसलिए, जो व्यक्ति मन की इच्छाओं का त्याग नहीं कर पाता, वह न तो सच्चा संन्यासी हो सकता है, न ही योगी। मन को एकाग्र करके परमात्मा से जुड़ना ही योग का सच्चा स्वरूप है, और यही संन्यास की भी परिभाषा है।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बता रहे हैं कि योग और संन्यास में कोई भिन्नता नहीं है। संन्यास वस्तुतः योग का ही एक रूप है, जो व्यक्ति मन के संकल्पों को त्याग देता है, वही सच्चा योगी बन सकता है।