अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म
भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
हिंदी अर्थ
हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण 'सच्चे सन्यास' का महत्व बताते हैं। सामान्यतः सन्यास का अर्थ त्याग, संयम और विरक्ति से लगाया जाता है, परन्तु यहाँ श्रीकृष्ण एक और महत्वपूर्ण पहलू को उजागर करते हैं।
सन्यासी वह नहीं जो केवल बाहरी वस्त्र या जीवनशैली से सन्यास का आचरण करे, बल्कि वह है जो अपने मन को सभी द्वेषों और इच्छाओं से मुक्त कर लेता है। इस श्लोक में "नित्यसन्यासी" शब्द का प्रयोग किया गया है, जो इंगित करता है कि सच्चा सन्यासी वह है जो हर समय, हर परिस्थिति में, अपनी भावनाओं और इच्छाओं को नियंत्रित रखता है।
द्वेष और कामना (अर्थात् किसी चीज़ की लालसा) ये दोनों ही मनुष्य को संसार के बन्धनों में बाँधने का काम करते हैं। जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति से द्वेष करते हैं, तो वह द्वेष हमारी सोच को बाँध देता है। इसी प्रकार, जब हम किसी वस्तु या स्थिति की अत्यधिक कामना करते हैं, तो उसकी प्राप्ति या प्राप्त न होने की चिंता हमें अशांत करती है।
श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को यह सिखा रहे हैं कि जीवन में सच्चा सुख और मुक्ति तभी संभव है जब हम इन द्वेष और कामनाओं के द्वन्द्वों से ऊपर उठकर निर्विकार हो जाएं। यह मानसिक अवस्था ही वास्तविक सन्यास है, जो मनुष्य को जीवन के बन्धनों से मुक्त कर देता है।
अतः इस श्लोक का संदेश यह है कि बाहरी संन्यास से अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक शुद्धि और द्वेष व कामनाओं से मुक्त मन। यही सच्चा सन्यास है जो व्यक्ति को सुखपूर्वक जीवन के बन्धनों से मुक्ति दिला सकता है।