अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 2

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संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच

सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।

तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥

हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि जीवन में मोक्ष प्राप्ति के लिए दो प्रमुख मार्ग होते हैं:

सन्न्यास: इसमें व्यक्ति संसारिक कर्मों का त्याग करता है और केवल ध्यान, साधना और तपस्या में लीन रहता है। इस मार्ग में व्यक्ति का ध्यान आत्म-चिन्तन और ब्रह्म-चिन्तन पर केंद्रित होता है।

कर्मयोग: इसमें व्यक्ति अपने कर्तव्यों को निभाते हुए, संसार में रहकर भी, बिना फल की इच्छा के, निष्काम भाव से कार्य करता है। कर्मयोग का मुख्य सिद्धांत यह है कि व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भगवान को अर्पित कर देना चाहिए, और अपने कर्मों से स्वयं को अलग समझना चाहिए।

श्रीकृष्ण के अनुसार, कर्मयोग सन्न्यास से श्रेष्ठ इसलिए है क्योंकि सन्न्यास में एक साधक को जीवन के सभी कर्तव्यों से विमुख होकर केवल ध्यान में लीन रहना होता है। जबकि कर्मयोग में व्यक्ति संसार के साथ जुड़ा रहता है, परन्तु वह स्वयं को कर्म के बंधनों से मुक्त रखता है।

कर्मयोग एक ऐसा मार्ग है जो सभी के लिए सुलभ है, जबकि सन्न्यास का मार्ग केवल कुछ ही विशेष लोगों के लिए है। इसलिए, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग अपनाने का उपदेश देते हैं, क्योंकि यह मार्ग उन्हें मोक्ष और जीवन की सच्ची शांति प्राप्त करने में अधिक सक्षम बनाता है।

इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, ईश्वर के प्रति समर्पित रहकर, कर्मों के फल से मुक्त होकर कार्य करना चाहिए।