अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 4

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संस्कृत श्लोक

साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌॥

हिंदी अर्थ

उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्‌-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक्‌ प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है

सरल हिंदी व्याख्या

श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञानयोग (सांख्य) और कर्मयोग (योग) में अंतर नहीं है। अज्ञानी लोग जो इस भेद को नहीं समझते, वे ही इसे अलग-अलग समझते हैं। लेकिन विद्वान जानते हैं कि ये दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं।

यदि कोई व्यक्ति ज्ञानयोग या कर्मयोग में से किसी एक को सही तरीके से अपनाता है, तो वह दोनों का ही फल प्राप्त करता है। इसका अर्थ यह है कि ज्ञान और कर्म दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। कर्मयोग में व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करता है और ज्ञानयोग में उसे आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार होता है। दोनों मार्गों पर चलने का परिणाम एक ही होता है—मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति।

इस प्रकार, श्रीकृष्ण यह कहना चाहते हैं कि चाहे हम ज्ञानयोग का अनुसरण करें या कर्मयोग का, दोनों में सही ढंग से स्थित होकर, हमें अंततः वही परम लक्ष्य प्राप्त होता है।