अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म
भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥
हिंदी अर्थ
जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम्: यहाँ "लभन्ते" का अर्थ है प्राप्त करना। "ब्रह्मनिर्वाण" का तात्पर्य है ब्रह्मा की स्थिति, यानी परमात्मा के साथ एकाकार हो जाना, जो कि संपूर्ण मुक्ति और शांति की स्थिति है।
ऋषयः क्षीणकल्मषाः: "ऋषयः" अर्थात् महान संत या ज्ञानी लोग। "क्षीणकल्मषाः" का अर्थ है जिनके सभी पाप समाप्त हो चुके हैं। ये लोग अपने कर्मों के परिणामों से मुक्त हो चुके हैं और उनके मन और आत्मा पर कोई दोष नहीं है।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः: "छिन्नद्वैधा" का अर्थ है द्वंद्व या द्वैत की समाप्ति। यहाँ "द्वैधा" का तात्पर्य है द्वैत या भेदभाव। यानि, ऐसे ज्ञानी लोग, जिनका आत्मा पूर्णतः एकीकृत हो चुका है और जिनके मन में किसी प्रकार का द्वैत या भेदभाव नहीं रह गया है।
सर्वभूतहिते रताः: ये लोग सभी प्राणियों के हित में समर्पित होते हैं। वे केवल अपने ही कल्याण की चिंता नहीं करते बल्कि सभी जीवों के लाभ और भलाई के प्रति समर्पित रहते हैं।
सारांश:
इस श्लोक का तात्पर्य है कि वे महान ऋषि और ज्ञानी लोग, जिन्होंने पापों से मुक्ति प्राप्त कर ली है, जिनका मन और आत्मा द्वैत की भावना से मुक्त है, और जो सभी प्राणियों की भलाई में लगे रहते हैं, वे ब्रह्मा की अमृतस्वरूप स्थिति को प्राप्त करते हैं। उनके जीवन की यह अवस्था पूर्ण शांति, सुकून और उच्चतम आत्मज्ञान की प्रतीक है।