अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म
भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥
हिंदी अर्थ
जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान कृष्ण योगी की विशेषता का वर्णन करते हैं। यहाँ "सन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तज्योर्तिरेव यः" वाक्य में यह कहा गया है कि एक सच्चा योगी वह है, जो आंतरिक सुख से परिपूर्ण और आत्मानंद में डूबा रहता है।
इस श्लोक के अनुसार, ऐसे योगी की आंतरिक स्थिति सुखद और शांति भरी होती है, क्योंकि वह आत्मा में स्थित दिव्य प्रकाश को महसूस करता है। वह अपनी आंतरिक स्थिति को जानता है और उसी में सुख अनुभव करता है।
इस प्रकार, "स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति" वाक्य का मतलब है कि ऐसा योगी ब्रह्मा के साथ एकरूप हो जाता है और ब्रह्मा के परम निर्वाण की स्थिति को प्राप्त कर लेता है।
कर्मयोग के संदर्भ में:
यह श्लोक कर्मयोग के सिद्धांत को भी स्पष्ट करता है। जब व्यक्ति अपने कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करके, बिना किसी आसक्ति के करता है, तो वह अपने आंतरिक सुख और ब्रह्मा के साथ एकता का अनुभव करता है। इस प्रकार, कर्मयोग के माध्यम से, व्यक्ति आत्मा के परम सत्य को जानकर ब्रह्मा की स्थिति को प्राप्त कर सकता है।
कुल मिलाकर, इस श्लोक में यह सिखाया गया है कि एक सच्चा योगी वह है जो आंतरिक शांति और आनंद का अनुभव करता है और ब्रह्मा के साथ एकता का अनुभव करता है।