अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 26

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संस्कृत श्लोक

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्‌।

अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्‌॥

हिंदी अर्थ

काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है

सरल हिंदी व्याख्या

कामक्रोधविमुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्: जिन साधकों ने काम और क्रोध को पूरी तरह से त्याग दिया है और जिनका मन पूरी तरह से संयमित और नियंत्रित है,

अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्: उनके लिए ब्रह्म की प्राप्ति, या ब्रह्मनिरवाण, बहुत निकट होती है, और वे आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके होते हैं।

विवेचना (Commentary):

यह श्लोक कर्मयोग के अंतर्गत उन साधकों की स्थिति को वर्णित करता है जिन्होंने अपने मनोबल और आत्मनियंत्रण को अत्यधिक परिष्कृत किया है। यहाँ 'काम' और 'क्रोध' का अर्थ है सांसारिक इच्छाएँ और आवेग, जिनसे मुक्त होना आवश्यक है। जब व्यक्ति इन दैहिक और मानसिक विकारों से उबर जाता है, तो उसकी आत्मा को ब्रह्म के अनुभव की प्राप्ति होती है।

इस श्लोक में ‘यतीनां’ से तात्पर्य उन योगियों से है जिन्होंने अपनी साधना के माध्यम से भौतिक और मानसिक इच्छाओं को नियंत्रित कर लिया है। वे व्यक्ति जिनका मन पूर्णतः स्थिर और केंद्रित है, वे ब्रह्मा (सच्चे आत्मा) के परम ज्ञान की ओर अग्रसर होते हैं। यहाँ 'विदितात्मनाम्' का मतलब है उन लोगों का जिनके पास आत्मा का ज्ञान है।

इस प्रकार, यह श्लोक यह संदेश देता है कि आत्मज्ञान और ब्रह्मानंद प्राप्ति के लिए, कर्म और विकारों से मुक्ति प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक है।