अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 18

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संस्कृत श्लोक

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

हिंदी अर्थ

वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी (इसका विस्तार गीता अध्याय 6 श्लोक 32 की टिप्पणी में देखना चाहिए।) ही होते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि एक सच्चे पंडित की दृष्टि सभी प्राणियों पर समान होती है। जब कोई व्यक्ति विद्या और विनय से सम्पन्न होता है, तो उसकी सोच में किसी भी जीव या जाति के प्रति भेदभाव नहीं रहता।

"विद्याविनयसम्पन्ने" का अर्थ है कि व्यक्ति शिक्षा और विनय से संपन्न है। "ब्राह्मणे" से तात्पर्य एक ब्राह्मण से है, जो विद्या और संस्कारों का पालन करता है। "गवि" से तात्पर्य गाय से है, "हस्तिनि" से हाथी से है, "शुनि" से कुत्ते से है, और "श्वपाके" से एक नीच जाति के व्यक्ति से है। श्रीकृष्ण का कहना है कि सच्चे पंडित (ज्ञानी) की दृष्टि में इन सभी जीवों की स्थिति में कोई अंतर नहीं होता। सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखा जाता है। यह श्लोक यह सिखाता है कि व्यक्ति को भौतिक रूप से विभाजित नहीं करना चाहिए और हर किसी के प्रति समान और निष्पक्ष दृष्टिकोण रखना चाहिए।