अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 17

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संस्कृत श्लोक

तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।

गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥

हिंदी अर्थ

जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण उन लोगों की विशेषताओं का वर्णन कर रहे हैं जो कर्मयोग की पूर्णता को प्राप्त कर चुके हैं। यहाँ पर 'तद्बुद्धय' से तात्पर्य है कि जिनकी बुद्धि और समझ परमात्मा (भगवान) के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है। 'तदात्मान' से अभिप्राय है कि जो लोग अपने आत्मा को भगवान के साथ एक मानते हैं और उनके प्रति पूर्ण आस्था रखते हैं।

ये लोग 'तन्निष्ठा' अर्थात् जो लोग भगवान के प्रति अपने निष्ठा और समर्पण में दृढ़ हैं और 'तत्परायणाः' अर्थात् जो लोग अपने जीवन को भगवान की सेवा और भक्ति के लिए पूर्ण रूप से समर्पित कर चुके हैं।

ऐसे व्यक्ति 'ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः' होते हैं, यानी जिनके ज्ञान ने उनके सारे पाप और अधर्म को समाप्त कर दिया है। इस प्रकार, ये लोग 'गच्छन्ति अपुनरावृत्तिं' अर्थात् वे मोक्ष की प्राप्ति के बाद पुनर्जन्म के चक्र से बाहर हो जाते हैं।

इस श्लोक में कृष्ण यह बताते हैं कि कर्मयोग के माध्यम से जब किसी व्यक्ति की बुद्धि और समर्पण भगवान के प्रति पूर्ण हो जाता है, तब उसकी आत्मा पापों से मुक्त हो जाती है और उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है।