अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म
भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥
हिंदी अर्थ
जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान कृष्ण कर्मयोग की महत्वपूर्णता को समझाते हैं।
साम्ये स्थितं मनः: इसका अर्थ है कि जिनका मन समता और संतुलन में स्थित है, वे लोग जीवन की विषमताओं और भिन्नताओं को समान दृष्टि से देखते हैं।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म: ब्रह्म (अर्थात, परम सत्य या ईश्वर) दोष रहित और समान है। यह ब्रह्म सब चीजों को समान रूप से देखता है, न कि किसी के प्रति भेदभाव करता है।
तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः: ऐसे लोग जो इस समता और संतुलन की स्थिति में होते हैं, वे ब्रह्म में स्थिर होते हैं, यानी वे आत्मा और परमात्मा के बीच एक गहरे संबंध में होते हैं और इस अवस्था में रहते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान कृष्ण यह बताना चाहते हैं कि एक व्यक्ति को अगर आत्मा के सच्चे स्वरूप को पहचानना है और मोक्ष प्राप्त करना है, तो उसे मानसिक संतुलन और समता को बनाए रखना होगा। जो लोग इस स्थिरता को प्राप्त करते हैं, वे ब्रह्म (ईश्वर) में स्थिर रहते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र से पार हो जाते हैं।