अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग

भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 3

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संस्कृत श्लोक

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।

अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्‍गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥

हिंदी अर्थ

इस संसार वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचार काल में नहीं पाया जाता (इस संसार का जैसा स्वरूप शास्त्रों में वर्णन किया गया है और जैसा देखा-सुना जाता है, वैसा तत्त्व ज्ञान होने के पश्चात नहीं पाया जाता, जिस प्रकार आँख खुलने के पश्चात स्वप्न का संसार नहीं पाया जाता) क्योंकि न तो इसका आदि है (इसका आदि नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब से चली आ रही है, इसका कोई पता नहीं है) और न अन्त है (इसका अन्त नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब तक चलती रहेगी, इसका कोई पता नहीं है) तथा न इसकी अच्छी प्रकार से स्थिति ही है (इसकी अच्छी प्रकार स्थिति भी नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि वास्तव में यह क्षणभंगुर और नाशवान है) इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूप (ब्रह्मलोक तक के भोग क्षणिक और नाशवान हैं, ऐसा समझकर, इस संसार के समस्त विषयभोगों में सत्ता, सुख, प्रीति और रमणीयता का न भासना ही 'दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्र' है) शस्त्र द्वारा काटकर (स्थावर, जंगमरूप यावन्मात्र संसार के चिन्तन का तथा अनादिकाल से अज्ञान द्वारा दृढ़ हुई अहंता, ममता और वासना रूप मूलों का त्याग करना ही संसार वृक्ष का अवान्तर 'मूलों के सहित काटना' है।)

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में श्री कृष्ण ने संसार वृक्ष का रूप और उसकी पहचान को स्पष्ट किया है। यहाँ बताया गया है कि इस संसार वृक्ष का वास्तविक रूप जैसा शास्त्रों में वर्णित है, वैसा साधारण दृष्टि से नहीं पाया जाता।

संसार वृक्ष, जिसको 'अश्वत्थ' अर्थात पीपल के वृक्ष के रूप में प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है, का स्वरूप यहाँ शास्त्रों में ही वर्णित है और प्रत्यक्ष अनुभव में नहीं आता। इसका कारण यह है कि इस संसार वृक्ष का न तो कोई निश्चित आदि है, न कोई निश्चित अंत है, और न ही इसकी स्थिति स्थिर है। इसका तात्पर्य यह है कि संसार का अस्तित्व अज्ञात काल से चलता आ रहा है और इसका अंत भी अनिश्चित है, साथ ही इसकी स्थिरता भी अस्थिर है, यानी यह नाशवान और क्षणिक है।

इसलिए, इस संसार वृक्ष को, जिसकी जड़ें अहंकार, ममता, और वासनाओं के रूप में गहराई में फैली हुई हैं, दृढ़ वैराग्य के शस्त्र द्वारा काटने का निर्देश दिया गया है। यहाँ 'दृढ़ वैराग्य' से तात्पर्य है कि इस संसार के भोगों और तात्कालिक सुख-सुविधाओं को नश्वर और क्षणिक मानकर उनसे विरक्त रहना चाहिए।

इस प्रकार, इस संसार वृक्ष को काटने का अर्थ है अपने भीतर के अहंकार, ममता, और वासना के जड़ों को समाप्त करना, जो कि इस संसार के अस्थिरता और नाशवान प्रकृति को समझकर किया जा सकता है।