अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग
भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥
हिंदी अर्थ
उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को एक महत्वपूर्ण शिक्षाएँ दे रहे हैं। वे बताते हैं कि यह संसार एक विशाल वृक्ष के समान है, जिसमें हम सभी जीवन के एक भाग के रूप में जुड़े हुए हैं। इस वृक्ष की उत्पत्ति और विस्तार की प्रक्रिया आदिपुरुष नारायण से हुई है, जो इस विश्व के परमेश्वर हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि हमें इस परमेश्वर को ठीक से खोजने का प्रयास करना चाहिए, जो उस परम पद (अधिकतम स्थिति) का स्वरूप है, जिसमें पहुँचने के बाद जीवात्मा पुनः संसार में लौटती नहीं है। अर्थात, जो परमेश्वर हमे मोक्ष प्राप्त करने के बाद संसार के पुनरागमन से मुक्त करता है।
इस श्लोक के माध्यम से यह सिखाया जा रहा है कि एक व्यक्ति को न केवल भगवान के अस्तित्व को जानना चाहिए, बल्कि उसे ध्यान और भक्ति द्वारा उस परमेश्वर की सच्ची पहचान भी करनी चाहिए। यह ध्यान और ध्यानानंद एक दृढ़ निश्चय के साथ होना चाहिए, जिसमें भगवान नारायण के प्रति पूर्ण विश्वास और समर्पण शामिल हो।
इस प्रकार, श्लोक हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में आदिपुरुष नारायण की खोज करें, उनके चरणों में शरण लें और मोक्ष की प्राप्ति के लिए गंभीर प्रयास करें।