अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग
भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
(संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय)
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
हिंदी अर्थ
श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले (आदिपुरुष नारायण वासुदेव भगवान ही नित्य और अनन्त तथा सबके आधार होने के कारण और सबसे ऊपर नित्यधाम में सगुणरूप से वास करने के कारण ऊर्ध्व नाम से कहे गए हैं और वे मायापति, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही इस संसाररूप वृक्ष के कारण हैं, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'ऊर्ध्वमूलवाला' कहते हैं) और ब्रह्मारूप मुख्य शाखा वाले (उस आदिपुरुष परमेश्वर से उत्पत्ति वाला होने के कारण तथा नित्यधाम से नीचे ब्रह्मलोक में वास करने के कारण, हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा को परमेश्वर की अपेक्षा 'अधः' कहा है और वही इस संसार का विस्तार करने वाला होने से इसकी मुख्य शाखा है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अधःशाखा वाला' कहते हैं) जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी (इस वृक्ष का मूल कारण परमात्मा अविनाशी है तथा अनादिकाल से इसकी परम्परा चली आती है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अविनाशी' कहते हैं) कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते (इस वृक्ष की शाखा रूप ब्रह्मा से प्रकट होने वाले और यज्ञादि कर्मों द्वारा इस संसार वृक्ष की रक्षा और वृद्धि करने वाले एवं शोभा को बढ़ाने वाले होने से वेद 'पत्ते' कहे गए हैं) कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। (भगवान् की योगमाया से उत्पन्न हुआ संसार क्षणभंगुर, नाशवान और दुःखरूप है, इसके चिन्तन को त्याग कर केवल परमेश्वर ही नित्य-निरन्तर, अनन्य प्रेम से चिन्तन करना 'वेद के तात्पर्य को जानना' है)
सरल हिंदी व्याख्या
श्रीभगवान इस श्लोक में संसार को एक विशाल पीपल के वृक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस संसार वृक्ष की जड़ों को "ऊर्ध्वमूल" यानी ऊँचाई में स्थिर मानते हैं, जो भगवान के रूप में प्रकट होते हैं। यह संकेत करता है कि आदिपुरुष परमेश्वर ही इस संसार के मूल हैं और नित्य हैं, जबकि संसार की शाखाएँ और पत्ते इस वृक्ष के विस्तार और विकास को दर्शाते हैं।
सांसारिक वृक्ष:
ऊर्ध्वमूल: यह शब्द आदिपुरुष परमेश्वर की ओर इशारा करता है, जो संसार के मूल कारण हैं। वे शाश्वत और नित्य हैं। अधःशाखा: इस संसार वृक्ष की शाखाएँ ब्रह्मा की प्रतीक हैं, जो इस संसार के विस्तार और विकास का काम करते हैं। अविनाशी: संसार का मूल तत्व अविनाशी है, जिसका अर्थ है कि परमात्मा स्वयं अविनाशी हैं और संसार भी उनकी परंपरा से उत्पन्न हुआ है। पत्ते: वेदों को इस संसार वृक्ष के पत्तों के रूप में दर्शाया गया है, जो यज्ञ और कर्मों के माध्यम से संसार की रक्षा और वृद्धि में सहायक होते हैं। ज्ञान का अर्थ: जो व्यक्ति इस संसार वृक्ष को इस दृष्टिकोण से समझता है और केवल परमेश्वर की ध्यान में रहता है, वह वास्तव में वेद के तात्पर्य को जानने वाला होता है। इसका अर्थ है कि इस संसार के क्षणभंगुर और दुःखद तत्वों से पार होकर परमेश्वर की नित्य और शाश्वत स्थिति को जानना ही वास्तविक ज्ञान है।
इस श्लोक के माध्यम से श्रीभगवान ने संसार की वास्तविकता और भगवत्प्राप्ति के मार्ग को स्पष्ट किया है, और यह भी बताया है कि जीवन में वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए परमात्मा की ओर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।