अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण
भगवद् गीता अध्याय 14, श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥
हिंदी अर्थ
क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि वे ही ब्रह्म (अपरिवर्तनीय परब्रह्म) का आधार हैं, वे ही अमृत और अव्यय (नाश से परे) हैं। वे ही शाश्वत धर्म (अनन्त धर्म) और सुख (शाश्वत सुख) का स्रोत भी हैं। यहां श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसी परम शक्ति के रूप में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही हर चीज के अस्तित्व का आधार हैं। उनके बिना कोई भी शक्ति, धर्म या सुख सम्भव नहीं है।
श्लोक में यह भी कहा गया है कि श्रीकृष्ण ही सच्चे सुख का स्थायी स्रोत हैं और उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि वे अनंत और अविनाशी हैं। इस प्रकार, श्लोक यह संज्ञान दिलाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की उपासना से हम अनन्त सुख और शाश्वत धर्म की प्राप्ति कर सकते हैं।
आध्यात्मिक संदर्भ: भगवान श्रीकृष्ण का यह संदेश हमें यह समझने में मदद करता है कि भगवान की उपासना और उनके गुणों का स्मरण हमारे जीवन में स्थायित्व, शाश्वत सुख और सही दिशा प्रदान कर सकता है। यह श्लोक आत्मा की अमरता और परमात्मा के अद्वितीय अस्तित्व की पुष्टि करता है।