अध्याय 11: विराट रूप
भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥
हिंदी अर्थ
आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में अर्जुन श्रीकृष्ण के विराट रूप का वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं, "हे विष्णु! आप अपने अग्निज्वलित मुखों से समस्त लोकों को चारों ओर से ग्रस रहे हैं। आपके प्रचण्ड तेज से यह समस्त जगत व्याप्त हो रहा है और आपकी उग्र किरणें इसे दग्ध कर रही हैं।"
यहां अर्जुन भगवान के उस रूप को देख रहे हैं जिसमें वे सृष्टि के सभी प्राणियों को समाहित कर रहे हैं। भगवान के मुख अग्नि के समान हैं, जो चारों ओर से समस्त लोकों को निगल रहे हैं। भगवान की इस दिव्य ज्योति से संपूर्ण संसार ओतप्रोत हो रहा है। उनकी यह उग्र किरणें अत्यंत प्रबल हैं, जो सब कुछ अपने तेज से जला रही हैं।
इस श्लोक के माध्यम से यह बताया जा रहा है कि परमात्मा का विराट रूप असीमित और अनन्त है। उनकी शक्ति और तेज अपरिमित है, जो संपूर्ण सृष्टि को अपने में समाहित कर लेता है। यहाँ भगवान विष्णु की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमानता को प्रकट किया गया है। उनका रूप इतनी तेजस्विता से भरा हुआ है कि कोई भी उसे सहन नहीं कर सकता, और यह सब कुछ नष्ट करने वाला प्रतीत होता है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें भगवान की महिमा, शक्ति और उनकी सर्वसमर्थता का बोध कराता है।