अध्याय 11: विराट रूप

भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 31

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संस्कृत श्लोक

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।

विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्‌॥

हिंदी अर्थ

मुझे बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइए। आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से उनके विराट रूप के बारे में पूछ रहे हैं। अर्जुन ने श्रीकृष्ण का विराट रूप देखा, जिसमें वह अनेक मुखों, अनेक आँखों और विभिन्न रूपों में दिखाई दे रहे थे। यह रूप अत्यंत भयानक था, जिससे अर्जुन भयभीत हो गए थे।

अर्जुन समझ नहीं पा रहे थे कि यह रूप किस उद्देश्य से धारण किया गया है और इसका क्या अर्थ है। इसलिए, वे विनम्रतापूर्वक भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि वे कौन हैं और यह विराट रूप क्यों धारण किया है। अर्जुन भगवान से कृपा की याचना करते हैं और यह जानना चाहते हैं कि भगवान का यह अद्भुत रूप किस बात का सूचक है।

इस श्लोक से यह पता चलता है कि जब किसी व्यक्ति को किसी महान शक्ति या सत्य का साक्षात्कार होता है, तो वह स्वाभाविक रूप से उसे समझने की जिज्ञासा और उस शक्ति से कृपा पाने की इच्छा करता है। अर्जुन की इस विनम्रता और जिज्ञासा से यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए विनम्रता और जिज्ञासा का होना आवश्यक है।