अध्याय 11: विराट रूप

भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 29

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संस्कृत श्लोक

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥

हिंदी अर्थ

जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने विराट रूप का दर्शन करा रहे हैं। अर्जुन ने भगवान के इस रूप में अनगिनत मुख और अनेकानेक रूप देखे, जिनसे अनंत तेज निकल रहा था। इस दृश्य को देखकर अर्जुन भयभीत हो गया।

श्रीकृष्ण के मुख में संसार के सभी प्राणी नष्ट हो रहे हैं, जैसे कोई पतंगे अग्नि में जलकर नष्ट हो जाते हैं। यहाँ 'पतंगे' का तात्पर्य उन जीवों से है, जो अपने अज्ञान और भ्रम के कारण माया में फंसे हुए हैं और उन्हें ज्ञात नहीं कि वे किस ओर जा रहे हैं। अग्नि में प्रवेश करने वाले पतंगों की तरह ये प्राणी भी श्रीकृष्ण के विराट रूप में समा रहे हैं, जो संहार और पुनरुत्थान के प्रतीक हैं।

इस श्लोक के माध्यम से यह समझाया जा रहा है कि समय और मृत्यु के सामने सभी जीव-जन्तु असहाय हैं और वे अनजाने में अपने अंत की ओर बढ़ रहे हैं। श्रीकृष्ण के मुख में इन जीवों का नाश केवल भौतिक शरीर का नाश है, जिससे वे इस संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। यह श्लोक जीवन के अस्थिर और क्षणभंगुर होने की ओर संकेत करता है, और यह भी बताता है कि भगवान के पास जाकर ही मोक्ष और शांति प्राप्त हो सकती है।

इस प्रकार, इस श्लोक में जीवन की नश्वरता और भगवान के विराट रूप की महिमा का वर्णन किया गया है।