BNSS धारा 447: मामलों और अपीलों को स्थानांतरित करने की उच्च न्यायालय की शक्ति

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 · अध्याय 33: आपराधिक मामलों का स्थानांतरण

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447. (1) जब भी इसे उच्च न्यायालय में पेश किया जाता है—
(ए) कि उसके अधीनस्थ किसी भी आपराधिक न्यायालय में निष्पक्ष और निष्पक्ष जांच या सुनवाई नहीं हो सकती है; या
(बी) कि असामान्य कठिनाई के कानून के कुछ प्रश्न उठने की संभावना है; या
(सी) कि इस धारा के तहत एक आदेश इस संहिता के किसी भी प्रावधान के लिए आवश्यक है, या पार्टियों या गवाहों की सामान्य सुविधा के लिए होगा, या न्याय के उद्देश्यों के लिए समीचीन है, यह आदेश दे सकता है—
(i) किसी भी अपराध की जांच या सुनवाई किसी ऐसे न्यायालय द्वारा की जाएगी जो धारा 197 से 205 (दोनों सम्मिलित) के तहत योग्य नहीं है, लेकिन अन्य मामलों में ऐसे अपराध की जांच या सुनवाई के लिए सक्षम है;
(ii) किसी विशेष मामले या अपील, या मामलों के वर्ग या अपीलों को उसके अधिकार के अधीन एक आपराधिक न्यायालय से समान या बेहतर क्षेत्राधिकार वाले किसी अन्य आपराधिक न्यायालय में स्थानांतरित किया जा सकता है;
(iii) किसी विशेष मामले को सुनवाई के लिए सत्र न्यायालय को सौंप दिया जाए; या
(iv) कि किसी विशेष मामले या अपील को स्थानांतरित कर दिया जाए और उसके समक्ष ही मुकदमा चलाया जाए।
(2) उच्च न्यायालय या तो निचली अदालत की रिपोर्ट पर, या इच्छुक पक्ष के आवेदन पर, या अपनी पहल पर कार्रवाई कर सकता है:
बशर्ते कि किसी मामले को एक आपराधिक न्यायालय से दूसरे आपराधिक न्यायालय में उसी सत्र प्रभाग में स्थानांतरित करने के लिए कोई भी आवेदन उच्च न्यायालय में नहीं दिया जाएगा, जब तक कि ऐसे स्थानांतरण के लिए आवेदन सत्र न्यायाधीश को नहीं दिया गया हो और उनके द्वारा खारिज कर दिया गया हो।
(3) उप-धारा (1) के तहत एक आदेश के लिए प्रत्येक आवेदन प्रस्ताव द्वारा किया जाएगा, जो, सिवाय इसके कि जब आवेदक राज्य का महाधिवक्ता हो, हलफनामे या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित होगा।
(4) जब ऐसा आवेदन किसी आरोपी व्यक्ति द्वारा किया जाता है, तो उच्च न्यायालय उसे किसी भी मुआवजे के भुगतान के लिए एक बांड या जमानत बांड निष्पादित करने का निर्देश दे सकता है जिसे उच्च न्यायालय उप-धारा (7) के तहत दे सकता है।
(5) ऐसा आवेदन करने वाला प्रत्येक आरोपी व्यक्ति लोक अभियोजक को आवेदन की लिखित सूचना, उन आधारों की एक प्रति के साथ देगा, जिन पर यह किया गया है; और आवेदन के गुण-दोष के आधार पर कोई आदेश तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि ऐसा नोटिस देने और आवेदन की सुनवाई के बीच कम से कम चौबीस घंटे न बीत गए हों।
(6) जहां आवेदन किसी मामले या अपील को किसी अधीनस्थ न्यायालय से स्थानांतरित करने के लिए है, उच्च न्यायालय, यदि वह संतुष्ट है कि न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो आदेश दे सकता है कि, निपटान लंबित रहने तक आवेदन पर अधीनस्थ न्यायालय में कार्यवाही पर रोक लगा दी जाएगी, ऐसी शर्तों पर जिन्हें उच्च न्यायालय लगाना उचित समझे:
बशर्ते कि इस तरह की रोक धारा 346 के तहत अधीनस्थ न्यायालय की रिमांड की शक्ति को प्रभावित नहीं करेगी।
(7) जहां उप-धारा (1) के तहत किसी आदेश के लिए आवेदन खारिज कर दिया जाता है, उच्च न्यायालय, यदि उसकी राय है कि आवेदन तुच्छ या कष्टप्रद था, तो आवेदक को किसी भी व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश दे सकता है। आवेदन का उतनी राशि का विरोध किया है जितनी वह मामले की परिस्थितियों में उचित समझे।
(8) जब उच्च न्यायालय उप-धारा (1) के तहत आदेश देता है कि किसी मामले को किसी भी न्यायालय से उसके समक्ष सुनवाई के लिए स्थानांतरित किया जाए, तो वह ऐसे परीक्षण में उसी प्रक्रिया का पालन करेगा जो उस न्यायालय द्वारा देखी जाती यदि मामला ऐसा नहीं होता। स्थानांतरित.
(9) इस धारा की कोई भी बात धारा 218 के तहत सरकार के किसी आदेश को प्रभावित करने वाली नहीं मानी जाएगी।

यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।

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