BNSS धारा 446: मामलों और अपीलों को स्थानांतरित करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 · अध्याय 33: आपराधिक मामलों का स्थानांतरण
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446. (1) जब भी सर्वोच्च न्यायालय को यह बताया जाता है कि इस धारा के तहत एक आदेश न्याय के उद्देश्य के लिए समीचीन है, तो वह निर्देश दे सकता है कि किसी विशेष मामले या अपील को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में या वहां से स्थानांतरित कर दिया जाए। एक उच्च न्यायालय के अधीनस्थ एक आपराधिक न्यायालय, दूसरे उच्च न्यायालय के अधीनस्थ समान या बेहतर क्षेत्राधिकार वाले दूसरे आपराधिक न्यायालय के अधीन।
(2) सर्वोच्च न्यायालय इस धारा के तहत केवल भारत के अटॉर्नी-जनरल या इच्छुक पार्टी के आवेदन पर कार्रवाई कर सकता है, और ऐसा प्रत्येक आवेदन प्रस्ताव द्वारा किया जाएगा, जो तब तक होगा जब आवेदक अटॉर्नी-जनरल हो। भारत के या राज्य के महाधिवक्ता को हलफनामे या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।
(3) जहां इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग के लिए कोई भी आवेदन खारिज कर दिया जाता है, सर्वोच्च न्यायालय, यदि उसकी राय है कि आवेदन तुच्छ या कष्टप्रद था, तो आवेदक को किसी भी व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश दे सकता है। आवेदन का इतनी राशि का विरोध किया है जितनी वह मामले की परिस्थितियों में उचित समझे।
यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।
इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 447. मामलों और अपीलों को स्थानांतरित करने की उच्च न्यायालय की शक्ति
- 448. मामलों और अपीलों को स्थानांतरित करने की सत्र न्यायाधीश की शक्ति
- 449. सत्र न्यायाधीशों द्वारा मामलों और अपीलों को वापस लेना
- 450. न्यायिक मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों को वापस लेना
- 451. कार्यकारी मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों को सौंपना या वापस लेना
- 452. दर्ज किए जाने वाले कारण