BNSS धारा 372: जब ऐसा लगे कि आरोपी स्वस्थ दिमाग का है
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 · अध्याय 27: विक्षिप्त मानसिकता के आरोपी व्यक्तियों के संबंध में प्रावधान
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372. जब पूछताछ या सुनवाई के समय अभियुक्त स्वस्थ दिमाग का प्रतीत होता है, और मजिस्ट्रेट उसके समक्ष दिए गए साक्ष्य से संतुष्ट है कि यह विश्वास करने का कारण है कि अभियुक्त ने एक कार्य किया है, जो कि, यदि वह होता स्वस्थ दिमाग, एक अपराध होता, और वह उस समय, जब कार्य किया गया था, मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण, कार्य की प्रकृति को जानने में असमर्थ था या कि यह गलत था या कानून के विपरीत था, मजिस्ट्रेट मामले को आगे बढ़ाएगा, और, यदि अभियुक्त पर सेशन न्यायालय द्वारा मुकदमा चलाया जाना चाहिए, तो उसे सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए सौंप दिया जाएगा।
यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।
इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 367. आरोपी के विकृत दिमाग का व्यक्ति होने की स्थिति में प्रक्रिया
- 368. विकृत दिमाग वाले व्यक्ति के मामले में अदालत के समक्ष मुकदमा चलाने की प्रक्रिया
- 369. जांच या मुकदमा लंबित रहने तक विकृत दिमाग वाले व्यक्ति की रिहाई
- 370. पूछताछ या मुकदमा फिर से शुरू करना
- 371. मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने वाले अभियुक्त पर प्रक्रिया
- 373. मानसिक अस्वस्थता के आधार पर बरी करने का निर्णय
- 374. मानसिक अस्वस्थता के आधार पर बरी किए गए व्यक्ति को सुरक्षित हिरासत में रखा जाएगा
- 375. प्रभारी अधिकारी को निर्वहन करने के लिए सशक्त बनाने की राज्य सरकार की शक्ति
- 376. प्रक्रिया जहां विकृत दिमाग वाले कैदी को अपना बचाव करने में सक्षम बताया जाता है
- 377. प्रक्रिया जहां हिरासत में लिए गए विकृत दिमाग वाले व्यक्ति को रिहा करने के लिए उपयुक्त घोषित किया जाता है
- 378. मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को रिश्तेदार या मित्र की देखभाल में सौंपना