BNSS धारा 371: मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने वाले अभियुक्त पर प्रक्रिया
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 · अध्याय 27: विक्षिप्त मानसिकता के आरोपी व्यक्तियों के संबंध में प्रावधान
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371. (1) यदि, जैसा भी मामला हो, जब आरोपी मजिस्ट्रेट या अदालत के सामने पेश होता है या फिर से लाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट या अदालत उसे अपना बचाव करने में सक्षम मानती है, तो जांच या मुकदमा आगे बढ़ाया जाएगा।
(2) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय अभियुक्त को अपना बचाव करने में अभी भी असमर्थ मानता है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय, जैसा भी मामला हो, धारा 367 या धारा 368 के प्रावधानों के अनुसार कार्य करेगा, और यदि अभियुक्त पाया जाता है मानसिक रूप से विक्षिप्त हो और परिणामस्वरूप अपना बचाव करने में असमर्थ हो, तो ऐसे अभियुक्त के साथ धारा 369 के प्रावधानों के अनुसार व्यवहार किया जाएगा।
यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।
इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 367. आरोपी के विकृत दिमाग का व्यक्ति होने की स्थिति में प्रक्रिया
- 368. विकृत दिमाग वाले व्यक्ति के मामले में अदालत के समक्ष मुकदमा चलाने की प्रक्रिया
- 369. जांच या मुकदमा लंबित रहने तक विकृत दिमाग वाले व्यक्ति की रिहाई
- 370. पूछताछ या मुकदमा फिर से शुरू करना
- 372. जब ऐसा लगे कि आरोपी स्वस्थ दिमाग का है
- 373. मानसिक अस्वस्थता के आधार पर बरी करने का निर्णय
- 374. मानसिक अस्वस्थता के आधार पर बरी किए गए व्यक्ति को सुरक्षित हिरासत में रखा जाएगा
- 375. प्रभारी अधिकारी को निर्वहन करने के लिए सशक्त बनाने की राज्य सरकार की शक्ति
- 376. प्रक्रिया जहां विकृत दिमाग वाले कैदी को अपना बचाव करने में सक्षम बताया जाता है
- 377. प्रक्रिया जहां हिरासत में लिए गए विकृत दिमाग वाले व्यक्ति को रिहा करने के लिए उपयुक्त घोषित किया जाता है
- 378. मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को रिश्तेदार या मित्र की देखभाल में सौंपना