BNS धारा 228: मिथ्या साक्ष्य गढ़ना

भारतीय न्याय संहिता, 2023 · अध्याय 14: मिथ्या साक्ष्य और लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों के विषय में

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228. जो कोई इस आशय से किसी परिस्थिति को अस्तित्व में लाता है, या किसी पुस्तक या अभिलेख या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में कोई मिथ्या प्रविष्टि करता है, या मिथ्या कथन अंतर्विष्ट रखने वाला कोई दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख रचता है कि ऐसी परिस्थिति, मिथ्या प्रविष्टि या मिथ्या कथन न्यायिक कार्यवाही में, या ऐसी किसी कार्यवाही में जो लोक सेवक के समक्ष उसके उस नाते या मध्यस्थ के समक्ष विधि द्वारा की जाती है, साक्ष्य में दर्शित हो और कि इस प्रकार साक्ष्य में दर्शित होने पर ऐसी परिस्थिति, मिथ्या प्रविष्टि या मिथ्या कथन के कारण कोई व्यक्ति जिसे ऐसी कार्यवाही में साक्ष्य के आधार पर राय कायम करनी है ऐसी कार्यवाही के परिणाम के लिए तात्विक किसी बात के संबंध में गलत राय बनाए, वह “मिथ्या साक्ष्य गढ़ता है", यह कहा जाता है ।

दृष्टांत

(क) क एक बक्स में, जो य का है, इस आशय से आभूषण रखता है कि वे उस बक्स में पाए जाएं, और इस परिस्थिति से य चोरी के लिए दोषसिद्ध ठहराया जाए । क ने मिथ्या साक्ष्य गढ़ा है ।

(ख) क अपनी दुकान की बही में एक मिथ्या प्रविष्टि इस प्रयोजन से करता है कि वह न्यायालय में सम्पोषक साक्ष्य के रूप में काम में लाई जाए । क ने मिथ्या साक्ष्य गढा है ।

(ग) य को एक आपराधिक षड़यंत्र के लिए दोषसिद्ध ठहराया जाने के आशय से क एक पत्र य के हस्तलेख की अनुकृति करके लिखता है, जिससे यह तात्पर्यित है कि य ने उसे ऐसे आपराधिक षड़यंत्र के सह अपराधी को संबोधित किया है और उस पत्र को ऐसे स्थान पर रख देता है, जिसके संबंध में वह यह जानता है कि पुलिस अधिकारी संभाव्यत: उस स्थान की तलाशी लेंगे । क ने मिथ्या साक्ष्य गढ़ा है ।

यह संदर्भ के लिए अधिनियम का पाठ है, 1 जुलाई 2024 तक अद्यतन। यह कानूनी सलाह नहीं है; प्रामाणिक पाठ के लिए आधिकारिक राजपत्र देखें।

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