अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
हिंदी अर्थ
प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान (प्रलयकाल में संपूर्ण भूत सूक्ष्म रूप से जिसमें लय होते हैं उसका नाम 'निधान' है) और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी महानता और सर्वव्यापकता का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि वे ही सब प्राणियों का अंतिम लक्ष्य हैं, अर्थात सभी जीव उन्हीं की ओर लौटते हैं। वे पालनकर्ता भी हैं, अर्थात वे अपने भक्तों का पालन-पोषण करते हैं। प्रभु के रूप में वे संसार के स्वामी हैं, जो सब कुछ नियंत्रित करते हैं। साक्षी के रूप में वे प्रत्येक जीव के कर्मों के साक्षी हैं, जो बिना किसी भेदभाव के सभी को देखते हैं।
भगवान निवास स्थान हैं, यानी सभी जीव उनके ही भीतर निवास करते हैं। वे शरणदाता हैं, जो संकट के समय में अपने भक्तों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। भगवान सच्चे मित्र हैं, जो सदैव अपने भक्तों के हित में कार्य करते हैं। वे ही सृष्टि के प्रारंभ का कारण हैं, और विनाश का भी कारण हैं।
स्थानं के रूप में वे स्थायित्व प्रदान करते हैं, जो इस संसार में स्थायित्व की भावना देते हैं। निधानं के रूप में वे सभी सम्पत्ति और धन के स्रोत हैं। और बीजमव्ययम् के रूप में वे अविनाशी बीज हैं, जो इस सृष्टि को बार-बार उत्पन्न करने की शक्ति रखते हैं।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान ने यह बताया है कि वे ही सभी जीवों के जीवन के हर पहलू में उपस्थित हैं और वही उनका अंतिम आश्रय हैं। यह श्लोक भक्तों को यह समझने के लिए प्रेरित करता है कि वे भगवान को ही अपना अंतिम लक्ष्य और आश्रय बनाएं।