अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति

भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 23

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संस्कृत श्लोक

( शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय )

यत्र काले त्वनावत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।

प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! जिस काल में (यहाँ काल शब्द से मार्ग समझना चाहिए, क्योंकि आगे के श्लोकों में भगवान ने इसका नाम 'सृति', 'गति' ऐसा कहा है।) शरीर त्याग कर गए हुए योगीजन तो वापस न लौटने वाली गति को और जिस काल में गए हुए वापस लौटने वाली गति को ही प्राप्त होते हैं, उस काल को अर्थात दोनों मार्गों को कहूँगा

सरल हिंदी व्याख्या

अध्याय 8, श्लोक 23 में भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण योगियों के आत्मसाक्षात्कार से संबंधित एक महत्वपूर्ण विषय पर प्रकाश डालते हैं। इस श्लोक का भावार्थ है:

"जिस समय (काले) योगी के शरीर की अंतर्मुखी स्थिति समाप्त हो जाती है और योगी तद्वैत के अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है, उस समय को मैं, हे भरतर्षभ, बताऊंगा।"

यह श्लोक आत्मा की साधना और मोक्ष की प्राप्ति की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि योगी जब अपने शरीर की मृत्यु के समय के करीब पहुंचता है, तो वह विशेष काल में अपने कर्मों और साधना के अनुसार विशिष्ट स्थिति में पहुंचता है। भगवान श्रीकृष्ण उन विशेष काल के बारे में विस्तार से बताएंगे जो योगी की प्राप्ति की प्रक्रिया से संबंधित है।

श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह संकेत देते हैं कि योगी का आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष प्राप्ति के लिए समय का एक विशेष महत्व होता है। इस काल में, योगी के कर्म और साधना का फल उसे मिल जाता है और वह अंतिम लक्ष्य की ओर बढ़ जाता है। यह श्लोक योग और आत्मा की स्थिति की गहराई को समझने में सहायक है और यह दर्शाता है कि योगी के लिए आत्मा के उच्चतम स्थिति को प्राप्त करने का समय कितना महत्वपूर्ण है।