अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति
भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥
हिंदी अर्थ
जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
सरल हिंदी व्याख्या
यह श्लोक भगवत्प्राप्ति की प्रक्रिया को समझाता है और बताता है कि जिस प्रकार के योगी या ब्रह्मविद (ब्रह्मा के ज्ञाता) उत्तम मार्ग से ब्रह्म को प्राप्त करते हैं, उनके लिए एक विशेष मार्ग होता है।
अग्निज्र्योतिरः श्रुक्लः - यहां 'अग्नि' और 'ज्योति' शब्द से तात्पर्य है कि जिस मार्ग पर यह लोग जाते हैं, वह उज्जवल और दिव्य है। 'श्रुक्ल' का अर्थ होता है 'श्वेत' या 'उज्जवल', जो इस मार्ग की शुद्धता और दिव्यता को इंगित करता है।
षण्मासा उत्तरायणम् - 'षण्मासा' का मतलब है 'छह महीने', और 'उत्तरायण' वह अवधि है जब सूर्य उत्तर की ओर बढ़ता है। यह अवधि शुद्धता और पुण्य का प्रतीक मानी जाती है।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति - इस मार्ग पर चलने वाले लोग वहाँ पहुंचते हैं जहाँ वे ब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं।
ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः - ब्रह्मविदों, यानी ब्रह्मा के ज्ञाताओं, का यह मार्ग है।
इस प्रकार, इस श्लोक का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि ब्रह्मा के ज्ञाता और सही मार्ग पर चलने वाले लोग एक दिव्य और शुद्ध मार्ग से ब्रह्मा तक पहुंचते हैं। यह मार्ग 'उत्तरायण' और 'श्वेत' या उज्जवल होता है, जो आत्मा की शुद्धता और दिव्यता का प्रतीक है।