अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति

भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 11

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संस्कृत श्लोक

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥

हिंदी अर्थ

वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परम पद को अविनाश कहते हैं, आसक्ति रहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन, जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह बताने का प्रयास किया है कि क्या ब्रह्म (अक्षर) है, जिसे वेदज्ञानी लोग और तपस्वी, जो राग और द्वेष से परे हैं, वर्णन करते हैं। इस अक्षर को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले लोग, जो ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस परम पद को किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं, इसकी जानकारी यहाँ दी जा रही है।

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति - वेदों के जानकार जो अक्षर (अध्यात्मिक सत्य) के बारे में बात करते हैं, उनका कहना है कि यह अक्षर अमर है, जो किसी भी प्रकार के परिवर्तन या क्षति से परे है।

विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः - उन साधुओं की बात की जा रही है, जो राग और द्वेष से परे हैं और जो इस अक्षर में प्रवेश प्राप्त करते हैं। ये तपस्वी केवल आंतरिक शांति और समर्पण के माध्यम से इस परम सत्य को प्राप्त करते हैं।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति - जो लोग ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हैं, अर्थात् संयमित जीवन जीना चाहते हैं, वे इस अक्षर को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं।

तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये - अब, मैं (भगवान श्रीकृष्ण) संक्षेप में इस परम पद की जानकारी तुम्हें देने जा रहा हूँ।

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि अक्षर ब्रह्म (परम सत्य) को जानने और पाने के लिए, तपस्वियों और ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले साधकों को मार्गदर्शन मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में उस परम सत्य के प्राप्ति के तरीके को संक्षेप में समझाने का आश्वासन देते हैं।