अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति
भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।
हिंदी अर्थ
वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि जब मृत्यु का समय आता है, तब आत्मा के सफल रूप से भगवान तक पहुँचने के लिए आवश्यक है कि:
मन को स्थिर और ध्यान केंद्रित रखना: आत्मा का प्रस्थान एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण है। इस समय मन को शांत और स्थिर बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि व्यक्ति अपने ध्यान को भगवान की ओर केंद्रित कर सके।
भक्ति और योग की शक्ति: भक्ति और योग की साधना से व्यक्ति का आत्मा उच्च स्तर की चेतना में प्रवेश करता है। यह साधना मृत्यु के समय भगवान को प्राप्त करने में सहायक होती है।
प्राण को 'आज्ञाचक्र' में स्थित करना: मृत्यु के समय प्राण को भृकुटि (भ्रू) के मध्य में सही स्थान पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। यह ध्यान केंद्रित करने का स्थान आत्मा के उच्च अवस्था की ओर मार्गदर्शन करता है।
परम पुरुष की प्राप्ति: इस प्रकार सही प्रबंधन और ध्यान द्वारा व्यक्ति अंततः भगवान की दिव्य उपस्थिति को प्राप्त करता है।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण जीवन के अंतिम समय में सही ध्यान और साधना के महत्व को समझाते हैं, जो आत्मा को सर्वोच्च ब्रह्मा तक पहुँचाने में सहायक होती है।