अध्याय 6: ध्यानयोग
भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥
हिंदी अर्थ
श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इस संसार में, विशेषकर इस योग मार्ग में, ऐसे व्यक्ति का कभी भी पतन नहीं होता जो ईश्वर की भक्ति और ध्यान में लीन रहता है। भगवान यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि योग और साधना के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति की कभी भी हानि नहीं होती।
विस्तार से:
"पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते" - इस अंश में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि इस जीवन या अगले जीवन में किसी भी स्थिति में, एक भक्त या साधक की साधना का फल व्यर्थ नहीं जाता। न तो इस संसार में और न ही परलोक में उसकी साधना और प्रयास व्यर्थ होते हैं।
"न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति" - भगवान श्रीकृष्ण यह भी बताते हैं कि जो व्यक्ति कल्याणकारी कर्म करता है, जो नियमित ध्यान और साधना में लीन रहता है, उसकी स्थिति कभी भी बुरी नहीं होती। वह हमेशा ऊँचाई की ओर अग्रसर होता है और कभी भी बुरी स्थिति का सामना नहीं करता।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह सिखाते हैं कि योग और ध्यान का मार्ग जीवन में आत्म-संस्कार और आत्म-उन्नति के लिए अनिवार्य है। यह व्यक्ति की यात्रा को सार्थक बनाता है और उसे निरंतर आगे बढ़ने में मदद करता है।