अध्याय 6: ध्यानयोग
भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥
हिंदी अर्थ
योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है
सरल हिंदी व्याख्या
यह श्लोक ध्यानयोग के संदर्भ में योगाभ्यास की सफलता और असफलता के बारे में चर्चा करता है। यहाँ पर यह स्पष्ट किया गया है कि योग में असफल होने पर भी व्यक्ति की प्रगति निष्फल नहीं होती। एक व्यक्ति जो योग के मार्ग में संघर्ष करता है और असफल होता है, उसे ऐसे पुण्यात्माओं की दुनिया प्राप्त होती है जिन्होंने अपने अच्छे कर्मों से उच्च लोकों का अनुभव किया है। इस श्लोक के माध्यम से यह सिखाया गया है कि योग की साधना और उसकी कठिनाइयाँ व्यर्थ नहीं जातीं। असफलता के बावजूद व्यक्ति को एक अच्छा और धार्मिक जीवन जीने का अवसर मिलता है, और उसकी साधना से प्राप्त पुण्य उसे पुनर्जन्म में भी लाभ पहुंचाते हैं।
इस प्रकार, योगाभ्यास में निरंतर प्रयास और समर्पण आवश्यक है, और असफलता की स्थिति में भी आत्मसमर्पण और धैर्य बनाए रखना चाहिए, क्योंकि हर प्रयास हमें एक नई दिशा और उन्नति की ओर ले जाता है।