अध्याय 6: ध्यानयोग

भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 35

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संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास (गीता अध्याय 12 श्लोक 9 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए।) और वैराग्य से वश में होता है

सरल हिंदी व्याख्या

मन की चंचलता: भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि मन की स्वभाविक चंचलता और अशांति को नियंत्रण में रखना बहुत कठिन है। यह बात जीवन के किसी भी क्षेत्र में सत्य है, विशेष रूप से ध्यान और साधना में।

अभ्यास की आवश्यकता: मन को नियंत्रित करने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। इसका अर्थ यह है कि ध्यान और साधना की प्रक्रिया को नियमित रूप से अपनाना होगा। केवल एक बार की कोशिश से सफलता नहीं मिलेगी, बल्कि निरंतर प्रयास से ही मन को नियंत्रित किया जा सकता है।

वैराग्य की भूमिका: वैराग्य का मतलब है, सांसारिक वस्तुओं और इच्छाओं से दूर रहना। मन को स्थिर करने के लिए केवल अभ्यास नहीं, बल्कि वैराग्य भी आवश्यक है। यह हमें भौतिक आकर्षणों और इच्छाओं से अलग कर, मन की शांति और स्थिरता प्राप्त करने में मदद करता है।

इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण हमें सिखाते हैं कि ध्यान और साधना में सफलता प्राप्त करने के लिए मन की चंचलता को नियंत्रित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इसके लिए निरंतर अभ्यास और वैराग्य की आवश्यकता है।