अध्याय 6: ध्यानयोग

भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 34

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संस्कृत श्लोक

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌॥

हिंदी अर्थ

क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में योगी या साधक के द्वारा मन की अस्थिरता और उसे नियंत्रित करने की कठिनाई को दर्शाया गया है। मन की चंचलता और अशांति को व्यक्त करते हुए, यह श्लोक यह मानता है कि मन को वश में करना अत्यंत कठिन कार्य है। इसे वायु को पकड़ने के समान बताया गया है, जो कि प्राकृतिक रूप से असंभव या बहुत कठिन होता है।

यहाँ पर श्री कृष्ण के प्रति यह भाव व्यक्त किया जा रहा है कि साधक को अपने मन को नियंत्रित करने में अत्यधिक कठिनाइयाँ महसूस होती हैं। इस श्लोक के माध्यम से, यह शिक्षा दी जाती है कि योग साधना में मन के संयम की महत्वता को समझना और उसे नियंत्रित करना बहुत आवश्यक है।

इस प्रकार, इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि मन की स्थिरता प्राप्त करना और उसे वश में करना एक बहुत कठिन कार्य है, और इसके लिए निरंतर अभ्यास और समर्पण की आवश्यकता होती है।