अध्याय 6: ध्यानयोग
भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
( विस्तार से ध्यान योग का विषय )
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥
हिंदी अर्थ
शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने ध्यानयोग के अभ्यास के लिए एक उपयुक्त स्थान और आसन का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि योगी को एक शुद्ध और पवित्र स्थान पर अपना आसन स्थापित करना चाहिए। यह आसन स्थिर होना चाहिए, न तो बहुत ऊँचा और न ही बहुत नीचा होना चाहिए। आसन के लिए चादर, मृगचर्म, और कुशा घास का उपयोग किया जाना चाहिए, जिससे आसन को स्थिरता और पवित्रता मिलती है। यह आसन ध्यान की अवस्था को बनाए रखने में सहायता करता है।